Excerpt for सब तुम्हारा by , available in its entirety at Smashwords


प्रकाशक


वर्जिन साहित्यपीठ

78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,

नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043








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प्रथम संस्करण - मार्च 2018

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कॉपीराइट © 2018

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सब तुम्हारा

(काव्य संग्रह)





रचनाकार

प्रणव प्रियदर्शी








समर्पण


जीवन के उन अहसासों को समर्पित

जिनके वशीभूत हो

कोई किसी को अपना बनाता है

या किसी का हो जाता है।






























प्रणव की कविताओं से गुजरना एक युवा मन की संवेदना और प्रेम से गुजरना है। कविता लेखन एक कला है, यह गहरी साधना और परिश्रम के साथ प्रतिभा की भी मांग करती है। प्रणव की कविताओं से गुजरते हुए उनके अंदर बैठे एक भावुक और संवेदनशील कवि से हमारा सामना होता है। यह कवि अपने शब्दों में किसी तरह की बनावट के साथ न आकर एकदम सहज रूप में सामने आता है। यह सही है कि कविता में सहज होना वास्तव में बड़ा कठिन काम है। सहजता कई बार लध्धड़ गद्य या सपाटबयानी में तब्दील हो जाने का खतरा साथ लिए चलती है। यहाँ यह देखना दिलचस्प है कि यह कवि सहजता के साथ कविता की संवेदना को भी बचाने की छटपटाहट से लैस है। इनकी कविताओं में मुझे बहुत संभावनाएँ दिखायी दे रही हैं। कवि का यह पहला संग्रह है और जाहिर है कि इसमें पहलेपन की एक सुगंध भी है।”

विमलेश त्रिपाठी




प्रेम और उससे उत्पन्न करुणा साहित्य के प्राणतत्व हैं और मनुष्य को मनुष्य होने का अहसास कराते हैं। प्रणव प्रियदर्शी का प्रस्तुत काव्य संग्रह ‘सब तुम्हारा’ प्रेम, मिलन, चाहना, वियोग, करुणा और उम्मीद की राहों से गुजरते हुए आध्यात्मिक तलाश की स्वछंद और निर्भीक अभिव्यक्ति है। काव्य संग्रह की सारी कविताएँ प्रेम की कविताएँ हैं, लेकिन उनके सोपान अलग-अलग हैं। कविता के चार सोपान हैं- मिलन, विरह, दर्शन और अध्यात्म। मिलन की कविताएँ जीवन में मधु रस का संचार करती हैं। दूसरे सोपान में वेदना कवि के चेतना का अभिन्न अंग बन जाती है। यही वेदना उन्हें शाश्वत चेतना से जोड़ती है, जो कि प्रेम का आध्यात्मिक स्वरूप है। आज के दौर में, खासकर युवा वर्ग में प्रेम को लेकर संशय की स्थिति बनी हुई है। प्रेम के नाम पर हर रोज हिंसक घटनाएँ हो रही हैं। ऐसे विषम दौर में प्रेम पर ‘सब तुम्हारा’ जैसे काव्य संग्रह का प्रकाशन निश्चित तौर पर अन्धकार में एक चमकीली रेखा के मानिंद है, जो दूर तक राह दिखाएगी।”


सुजीत सिन्हा






प्रणव प्रियदर्शी


जन्म तिथि: 12-01-1984

पिता: डॉ. कृष्ण मोहन झा

मां: गायत्री देवी


वर्तमान पता: मकान नं : 51, न्यू को-ऑपरेटिव कॉलोनी, कडरू

रांची : 834002 (झारखण्ड)

स्थायी पता: ग्रा.पो.- शेरपुर, भाया-विष्णुपुर

थाना- सकतपुर, जिला-दरभंगा-847407 (बिहार)


शिक्षा: स्नातक (हिंदी प्रतिष्ठा); स्नातकोत्तर (पत्रकारिता एवं जनसंचार)

संप्रति: प्रभात खबरराँची के संपादकीय विभाग में कार्यरत।

लेखकीय उपलब्धियाँ: वर्तमान साहित्य, सनद, देशज, परिकथा, साहित्य अमृत, साहित्य परिक्रमा और कादंबिनी सहित कई पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।


मोबाइल: 9905576828, 7903009545

ईमेल: kumarpranav544@gmail.com; Pranav.priyadarshi.pp@gmail.com

वेबसाइट: kumarpranav544.blogspot.in; Pranavpp.blogspot.com

https://www.facebook.com/pranav.priyadarshi.357


आत्मकथ्य


जिंदगी इंसान को कभी-कभी बड़े ही अद्भुत मोड़ पर लेकर चली आती है। इस मोड़ पर पहुँच कर उसे खुद पर कोई वश नहीं रहता और नियति अपनी बाँहों में समेट लेती है। यहां लेकिन, किंतु, परंतु, अन्यथा, ऐसे-वैसे के कोई मायने नहीं रह जाते। लौटने के बाद उसकी साँसों के तार इस दुनिया से जरूर जुड़े रहते हैं, लेकिन वह किसी और देश का वासी हो जाता है। उसे निर्विकल्प जीने का मकसद भी मिल जाता है। हालांकि जब धनार्जन ही जीवन का एक मात्र विकल्प हो गया हो तो ऐसे मकसद को कोई नकार दे, यह अलग बात है। इतिहास गवाही देता है कि जीवन के महान लक्ष्य हर हमेशा प्रेम के क्षण में ही प्रस्फुटित हुए हैं। वह प्रेम किसी के सानिध्य में सर झुकाने से उपजा हो अथवा अकेलेपन में संवेदनाओं की डोलती धार से निकल आया हो। प्रेम की उसी दिव्यता को रेखांकित करने की कोशिश है यह कविता संग्रह।

प्रेम के साथ कठिनाई यह है कि वह हमारे सामने कई आयामों में प्रगट होता है। आजकल समय का प्रवाह जिस आवेग से आदमी को बहाए ले जा रहा है, ऐसे में प्रेम के स्वरूप और ढंग में भी बहुत बदलाव आया है। यह विकृति अधिक, संस्कृति कम बन रही है। अपने प्रेम को पहचानना, उसकी दिव्यता संजोना और उसे नूतन आयामों से संपृक्त करना, सबसे बड़ी चुनौती हो गई है। इन चुनौतियों के साथ जूझने की शक्ति यह कविता संग्रह प्रदान कर सके तो मैं अपनी मेहनत सफल होता हुआ पाऊँगा। लाजिमी है कि जिसने अपने मन की सबसे कोमल और मधुरतम भावना प्रेम को नहीं बचा पाया, वह और क्या बचा पाएगा! अगर प्रेम को खोकर कुछ बचा भी लिया, तो वह निस्सार हो जाएगा।

आज भी जब मैं कोई कविता लिखने बैठता हूँ तो मन में सहसा एक प्रश्न उभरता है कि यह कविता क्यों और किसके लिए? कविताओं की अजस्र भीड़ के बीच फिर एक कविता क्यों? दूसरे स्थापित कवियों को छोड़ कर पाठक क्यों पढ़ेंगे मेरी कविता? इन प्रश्नों से जूझते रहने के कारण ही मैंने इस कविता संग्रह में कई ऐसे शिल्प, तत्व और विषयों का भी समावेश किया है, जो सर्वथा अछूते रह जाते हैं। अपनी बातों को सहजता से कहने के लिए कई जगहों पर प्रचलित विधान और काव्य परिपाटी भी तोड़े गये हैं। इन नूतन आयामों को पाठक और समीक्षक आत्मसात कर सकें तो मेरा उद्देश्य पूरा होगा।

और अंत में मुझे यह कहना भी जरूरी लग रहा है कि इस कविता संग्रह की अधिकांश कविताएँ मेरी स्नातक की पढ़ाई के दौरान लिखी गयी है। बाद में परिवर्धित और परिष्कृत की जाती रही हैं। लेकिन किशोरावस्था से युवावस्था में प्रवेश के दौरान मन के भीतर जो निष्कपटता और निश्छलता होती है, वह बरकरार रहे इसका ख्याल रखा गया है। उसका भी रसास्वादन आप मेरी कविताओं में कर सकें तो उस उम्र में मिली नेमत की सार्थकता होगी।

प्रेम


उसने पूछा था -

मनुष्य की प्यास क्या है?

मैंने कहा - प्रेम।

कैसे?

यह संघर्षित जीवन को

स्नेह स्पंदित कर

करुणा कछार पर

या भावनाओं के तार पर

जीने का अहसास देता है

अस्तित्व के करीब लाकर

आदमी को

एक अनुगूंज बना देता है।

उसने पूछा-फिर प्रेम क्या है?

मैंने कहा-

जो श्रद्धा के आँचल में

स्नेह दीप बन

चिर असीम

सौंदर्य की पनाहों में

रोशनी करता है

उसका एक नाम प्रेम होता है,

तो क्या मैं गलत था?



















प्रेम का जन्म


उसके स्नेह की ज्योति

जब-जब भी

स्नेहिल वेग से

मेरे स्निग्ध मन पर

कोमल स्पर्श देती है

तब-तब मेरे भीतर

मजबूती से खड़ी

मैं’ की भावनाओं को

पिघला कर गिरा देती है

मेरी गहराई

उजागर कर देती है

वहाँ एक रिक्तता बना देती है

शून्यता स्थापित कर देती है

जहाँ से मुझमें छिपी

प्रेम की भावना

उसके लिए उद्वेलित होने लगती है

किसी ने कहा था मुझसे :

शून्य से प्रेम का जन्म होता है

शून्य में दूसरे शून्य से

मिलने की क्षमता है

सिर्फ शून्य ही

शून्य से मिल सकता है

शून्य की, रिक्तता की

कोई दरो-दीवार नहीं होती

और की होती होगी।















प्रेम देना है...


उस रात अचानक

जब मैं घर से

नंगे पैर निकला था

सब निस्तब्ध था

लेकिन कहीं दूर जिंदगी

नये आयामों में प्रवेश कर रही थी


चाँदनी नहला रही थी नदी को

हवाएँ स्पर्श दे रही थी

फूल सुगंध पहना रहा था उसे

प्रकृति निहाल हो रही थी


इस बीच मैं

पत्थर को भी देखता

तो प्रेम जगता

काँटे को भी देखता

तो प्रेम जगता

जानवर को भी देखता

तो प्रेम देने को जी चाहता


लग रहा था सुरम्य वादियों से

एक आवाज आकर

कह रही हो मुझे-

तेरे मार्ग पर जो भी पड़ जाए

तू उससे प्रेमपूर्ण हो जा

उतने ही तेरे जीवन में

आनंद की संभावना बढ़ेगी


क्योंकि यह सवाल

पत्थर, काँटे, फूल और जानवर को

प्रेम देने का नहीं है

तुम्हारे प्रेमपूर्ण होने का है।








प्रेम का रूप


प्रेम की

धिमी-धिमी हवा

जब प्राणों को छूती है

कहीं स्नेह उठता है

कहीं संगीत बजता है


प्रेम की धारा

जब मन से गुजरती है

मन-मीत लगती है

मन-माधुर्य बनती है


प्रेम की हँसी

जब दिल में उतरती है

शरीर का पोर-पोर इठलाता है

रोम-रोम मुस्कुराता है


प्रेम का दीप

जब हृदय की

धरा पर जलता है

संसार सुहाना लगता है

प्रकृति का रंग-रूप और सुगंध

व्यथित हृदय को शंति देता है।


















प्रेम का रंग


कभी अमरलता बन

सहज अनुराग पर

फैल जाता है

कभी लाजवंती की तरह

हृदय की साँकल में

सिमट आता है।


कभी ओस-सी

सिमटी शीतल बूँद बन

भावनाओं की दूब को

शीश से तल तक धो देता है

कभी नदी की लहर-सी

मेरी वेदनाओं को हिलकोर देता है।


कभी फूल बन

स्वप्निल बगियों को

महका देता है

कभी वसंत की तरह

यौवन को जगा

उत्साहित मौज के साथ

जीने का संदेश देता है।


कभी संगीत बन

शांति के क्षण में

जिंदगी का साज

छेड़ जाता है

और न जाने कितनी बार

अपने विस्तीर्ण प्रकाश में

अलग-अलग व्यवहार के साथ

समय को समेट लेता है।


इसलिए मुझे

कहना पड़ता है बार-बार

प्रकृति के रंग केवल सात

प्रेम के रंग गिनती के पार।





प्रेम का प्रमाण


प्रेम को इन हाथों से

समेट कर न जी सका,

भीगी पलकों से पैबंद कर

अपने भीतर न रोक सका।

आत्मा का स्वभाव है यह

अहसास बन कर रहता,

अस्तित्व के लय में लीन

अमरत्व के साथ पलता।


प्रेम को शब्द के बंध से

दूसरों को बताएँ कैसे?

तर्क की कसौटी पर रख

दूसरों को समझाएँ कैसे?


प्रेम का प्रमाण खोजनेवाला

स्वयं उसी में खो जाता है,

जीभर कर स्वाद चखनेवाला

मौन के साथ हो जाता है।


है अगर पास में हिम्मत

तो हमारे साथ हो जाओ,

ना चल सको डगर पर

तो हिम्मत पहले जुटा लो।


अंगारों से सनी राह है यह

चलने से पहले बहुत सोचा,

हमारे दिल में भी आँच है

कैसे कहूँ आगे क्या होगा?











कविता का वरदान


बचपन से ही

एकांत, अकेले

स्नेह स्पन्दित क्षणों में

विचारों की डोर पकड़

जब-जब मन झूलता

अंतस्तल की गहराई से

प्राणों की प्यास उमड़ती

जो मेरे

अकेलेपन को समेट कर

काव्यमय ऊर्जा बना देती

अब काव्यमय प्यास की

मदमस्त स्नेह-सुधा रस

पवित्र गंगा

सागर की तलाश में

किसी अन्य धारा से जुड़ कर

एक संगम स्थापित

करना चाहती है

ताकि स्नेह रस उमड़ पड़े

काव्य का आयाम

कविता का वरदान मिल सके

मौन कुछ इस तरह से धुल सके।



















पहले कदम पर ही


अनगिनत भावों की

दलदली अभिप्सा के बीच

मैं फँस जाता था

सोचता रहता था

किसके साथ बहूँ

किसका साथ गहूँ


लेकिन जब

सतह की जमीन खिसकी

शीशे की उम्र टूटी

मेरे भीतर से लकीड़ बनाती हुई

कोई चीज गुजरी


रात गुजरने के बाद

धरती से कुछ ऊपर उठ कर

और आकाश से थोड़ा

नीचे उतर कर

किसी ने कुछ

तो किसी ने कुछ चुना

लेकिन सहरा की भीगी रेत चूम

मैंने प्रेम चुना


अपनों ने कहा मुझसे

यह बड़ा क्रांतिकारी निर्णय है

और हर निर्णय

सोच-समझ कर लेना चाहिए

तुम कहाँ पहुँचोगे

यह इस बात पर निर्भर करता है

कि तुमने पहला कदम

किस दिशा में उठाया है

यही कारण है कि

मैंने पहले कदम पर ही

प्रेम को चुन रखा है।







अपना हाथ बढ़ाओ


आकाश के वक्षस्थल पर

चमकेंगे

हम दोनों सितारा बन कर

रात अभी साँवली है

तो क्या हुआ

मायूसी के कुहासे को चीर

हमारा दिन निकलेगा

आशा की सिंदूरी किरणों से नहा

चमक उठेगा जर्रा-जर्रा


तुमने शायद ध्यान नहीं दिया

कुहरे, बादल,

आँधी, तपिश

फुसफुसा कर

बहुत कुछ कहते हैं


ओस, खुशबू,

बारिश, शीतलता

इसके साथ रहती हैं


अपना हाथ बढ़ाओ

मैं थाम लूँगा,

आजीवन तुम्हारा नाम लूँगा।

















आज पहली बार


आज पहली बार

कुहुक उठा था कोयल

मेरे घर के ऊपर

छत की मुंडेर पर

फुदक रही थी मैना

आकाश की तल्लीनता ओढ़े

पहली बार


इतनी प्यारी

कभी नहीं लगी थी मुझे सुबह

न कोयल, न मैना और आकाश

कुछ घटित-सा हुआ है

मेरे भीतर पहली बार

कोई पूर्वाभास

अनंत यात्रा में

शायद कुछ देर

समय का सफर

तय किए थे हम साथ-साथ


शायद इसी कारण

इस जनम में

मेरे भीतर असीम

अपनापन जगाता है

तुम्हारा कुछ देर का साथ

अलग होकर भी

एक होने का आभास

किसी विस्मृत क्षण का

अचानक प्रगट होकर

एकाकार हो जाने का अनुराग

तुम्हारे जाने के बाद भी

तुमसे जुदा नहीं होने देता मुझे


इस सब के बावजूद

स्थूल जगत में

मूल और फूल की तरह

हमारे अलग-अलग

रहने की विवशता

एक होने की असंभावना


लगता है मुझे कि

ईश्वरीय भूल से है उपजी दुर्घटना


ये सब अगर है

सिर्फ मन का विभ्रम

तो क्यों रहता है मुझे रात भर

सुबह होने का इंतजार?

खुशी देने के साथ-साथ

क्यों कोसती है मुझे

कोयल के लिए पसरी छत

मैना के लिए फैला आकाश?

क्यों तुम उतर आयी हो

मेरी कविता में आज?

क्यों यह पहली कविता

तुम्हारे लिए बनी है पहली बार?




























क्या नाम दूँ


इस शांत, स्नेहिल

और निर्द्वन्द्व

इच्छाहीन, तृप्त

एवं स्वच्छंद मन को

क्या नाम दूँ?

जी करता है

तुम्हारी साँसों में इसे ढाल दूँ।


शून्य की तरह रिक्त

सावन-सी हरियाली

धुँध-सी हल्की

ओस-सी शीतल

अंतस्तल को क्या नाम दूँ?

जी करता है

तुम्हारे अंजुमन में इसे टाँक दूँ।


आहिस्ता-आहिस्ता बजता

शब्दों का साज

बीते क्षणों की याद

बदलियों-सा बदलता

स्वारालाप को क्या नाम दूँ?

जी करता है

तुम्हारी धड़कनों में इसे अंजाम दूँ।


भावना की तरलता

भावुकता की अस्मिता

चित्त की सहजता

और

मन की सरलता को

क्या नाम दूँ?

जी करता है

तुम्हारे दामन से इसे बाँध दूँ।








सब तुम्हारा


मेरे जीवन में

जो रोशनी है

जगा रही अंतस्तल में

एक आशा

सब तुम्हारा।


ग्लानि या

विपत्ति के पल

अहं जब चोट खाकर

गिर जाता

मन-मलिन

कुछ कह नहीं पाता

सब तुम्हारा।


स्नेह-सुधा रस पीकर

हलाहलें भी

चख-चख कर

तृप्ति के क्षणों में

जो मेरे भीतर जगता

सब तुम्हारा।


मेरी और न कोई चाहत

मेरा न कोई वजूद

बस तेरी कहानी

मेरी रवानी

मैं ठहरा एक साया

सब तुम्हारा।


मेरी हर खुशी

तुम्हारे साथ जुड़ी

मेरा हर दर्द

तुमसे ही आया

कहीं कुछ चमक कर

अचानक खो जाता

सब तुम्हारा।





एक गीत ऐसा गाना चाहता हूँ...


वर्षात की झंकार

वसंत की बहार

प्रीतम का प्यार

ओठों पर लाना चाहता हूँ

एक गीत ऐसा गाना चाहता हूँ...


कोयल का स्वारालाप

मोर के भीतर का अनुराग

चकोर के विभ्रमों का संसार

सौंदर्य का नतमस्तक लाज

वाणी को उपहार देना चाहता हूँ

एक गीत ऐसा गाना चाहता हूँ...



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