Excerpt for थोड़ा सा पानी by , available in its entirety at Smashwords



प्रकाशक


वर्जिन साहित्यपीठ

78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,

नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043








सर्वाधिकार सुरक्षित

प्रथम संस्करण - मार्च 2018

ISBN







कॉपीराइट © 2018

वर्जिन साहित्यपीठ








कॉपीराइट


इस प्रकाशन में दी गई सामग्री कॉपीराइट के अधीन है। इस प्रकाशन के किसी भी भाग का, किसी भी रूप में, किसी भी माध्यम से - कागज या इलेक्ट्रॉनिक - पुनरुत्पादन, संग्रहण या वितरण तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक वर्जिन साहित्यपीठ द्वारा अधिकृत नहीं किया जाता।

थोड़ा सा पानी

(लघुकथा संग्रह)









लघुकथाकार

राजेश मेहरा





वर्जिन साहित्यपीठ



राजेश मेहरा

09810933690

rajeshkumar5970@rediffmail.com



मैं राजेश मेहरा मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक हूँ। मैं दिल्ली में रहता हूँ। मुझे लेख, कविताएँ, लघुकथाएँ व कहानियाँ लिखने का शौक है। बचपन से ही मैं किताबों और कहानियों का शौक़ीन रहा हूँ। मेरा मानना है कि आज की भाग-दौड़ और तनाव भरी जिन्दगी में कहानियों के सपनों में जीने से ही आदमी अपनी कुछ उम्र बढ़ा सकता है।














आदर्श



राजू अपने पापा के साथ संडे बाजार जा रहा था तभी एक कार उनके पास रुकी और उसमें से आवाज आई "अरे ललित कहाँ जा रहे हो, कहो तो में तुम्हे छोड़ दूं?  राजू के पापा ने मना कर दिया तो वह कार वाला आदमी उसकी पत्नी और बच्चे कुटिल मुस्कुराहट के साथ आगे बढ़ गए।

राजू ने कहा " पापा ये तो राजीव अंकल है जो आपसे नॉकरी मांगने हमारे घर आये थे और उनकी आपने नौकरी लगाई थी।"

राजू के पापा ने हां में सिर हिलाया।

"ये वहीँ है ना जिन्होंने आपके मालिक से चापलूसी करके उनसे दोस्ती कर ली और आपको भी नॉकरी से निकलवा दिया ताकि आप उनके रास्ते में ना आ पायें।" राजू थोड़ा रुका और फिर बोला "पापा देखो आज उनके पास गाडी और सब कुछ है और आपके पास जॉब भी नही है।"

राजू के पापा अब लाचारी से राजू की तरफ देख रहे थे।

राजू फिर बोला "पापा आप कहते है कि किसी अच्छे इंसान को अपना आदर्श बनाना लेकिन में राजीव अंकल को अपना आदर्श बनाऊँगा।

राजू के पापा बोले" लेकिन राजू वो तो अच्छे आदमी नही है उन्होंने धोखेबाजी की है ।"

राजू थोड़ा गंभीर होकर बोला " पापा कुछ भी हो लेकिन वो हम से आगे तो निकल जाएंगे हर चीज में और हम और भी पीछे रह जाएंगे, इस दुनिया में तरक्की ही आदमी की संपन्नता का पैमाना है चाहे कोई बेईमानी से बने उसे कोई नही देखता।"

राजू के पापा की आँखों में नमी थी।

राजू को दी गई उनकी शिक्षा आज राजीव के उदाहरण से हार गई थी।

दूर जाती राजीव की कार धूल उड़ाती हुई जा रही थी और सब धुंधला हो गया। राजू अपने पापा की ऊँगली पकड़ संडे बाजार वाले रास्ते पर हो लिया। राजू का चेहरा कठोर था।






















बातचीत



रजत को सीढ़ियां चढ़ते देख बूढी माँ ने कहा 'बेटा अपने पापा से बात कर लिया करो वो बहुत याद करते है तुम्हे, महीनो हो गए तुम्हे देखने को तरसते रहते है' रजत तेजी से चढ़ते हुए थोड़ा रुका और बोला 'ओहो माँ में फ़ोन से बात कर तो लेता हूँ और ऊपर सेकंड फ्लोर पर ही तो हूँ कहीं जा तो नही रहा' इतना कह कर वह ऊपर चढ़ गया। ऐसा नही था कि रजत अपने पापा से बात नही करना चाहता था लेकिन ऑफिस का प्रेशर, बच्चो की परेशानी, वाइफ की अपनी प्रोब्लेम्स को लेकर वह बहुत परेशान रहता था और शायद कहीं ना कहीं वो सोचता था शायद एक दिन सब ठीक हो जायेगा और फिर अपने पापा से वह जी भर कर आमने सामने बैठ कर खूब बात करेगा। अभी रात के 11 बजे थे रजत लैपटॉप पर काम कर रहा था आज उसने फोन पर अपने पापा से भी बात नही की थी। रजत की वाइफ गहरी नींद में सो रही थी। अचानक उसकी माँ की रोने की आवाज आई तो रजत नीचे भागा। जब वो नीचे पहुंच तो उसने देखा की उसके पापा सीढ़ियों पर गिरे पड़े है। रजत की माँ बोली 'मना करने पर भी नही माने और कहने लगे की रजत से में मिलके आता हूँ और गिर गए' रजत ने देखा की उनकी साँसे बन्द हो गई थी और उनकी आँखे रजत की तरफ ही देख रही थी, इस उम्मीद में की रजत अब बात करेगा। शायद अब देर हो चुकी थी। रजत अपने आँसू रोक नही पा रहा था और अपने पापा को गोदी में लेकर बच्चो की तरह रो रहा था। 





























बाल दिवस



"बाबा, ये बाल दिवस क्या होता है?" राजू ने खेत में अपने बाबा के साथ काम करते हुए पूछा। राजू के बाबा थोड़ा चोंके और फिर सहज होकर मिटटी खोदते हुए बोले "राजू हमारे देश के पहले प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू जी बच्चो से बहुत प्यार करते थे इसलिय उन्होंने कहा था कि मेरे जन्म दिवस को सारे बालक मिलकर मनाए इसलिय उसे बाल दिवस कहते है |"

राजू ने थोड़ी देर सोचा और फिर बोला "बाबा क्या जवाहर लाल नेहरू जी सिर्फ स्कूल जाने वाले बच्चों से ही प्यार करते थे, क्या वो मेरी तरह स्कूल ना जाने वाले बच्चों से प्यार नही करते थे और यदि करते थे तो हमारे लिये कोई बाल दिवस क्यों नही मनाता?"

बाबा को कोई जवाब नही सूझा। उसने टालने के लिये राजू को दूर रखा बीजों का टोकरा लाने को कहा। राजू तुरंत टोकरा लाने चला गया।

राजू के बाबा की आँखों में आंसू थे और राजू को स्कूल ना भेज पाने की असर्मथता का दुःख भी। 

राजू के बाबा बड़बड़ा रहे थे " राजू जिस दिन गरीब किसान और मजदूरों के बच्चों के लिये बाल दिवस मनने लगेगा उस दिन समझ लेना की भारत ने सचमुच आजादी पाई है|"

































बेरोजगारी



मुकेश ने राजू से पूछा,आपका ड्राइवर कहाँ है कुछ दिनों से दिखाई नही दे रहा?" राजू बोला "क्या बताऊँ एक दिन वो मेरा फोन नहीं उठा रहा था तो मैने उससे पूछा बस इसी बात पर मुझसे गुस्सा हो कर चला गया।"
"सुनने में आया की उसकी आर्थिक हालात ठीक नही है इसलिए वो अपने बीबी बच्चो सहित अपने ससुराल चला गया है " राजू ने आगे कहा। "उसको मेने दो बार फोन भी किया लेकिन वो मना कर रहा था काम करने के लिए"
मुकेश बोला "आजकल के लड़को में इतनी गर्मी कैसे गई है भूखे मर जायेंगे लेकिन सुलह नहीं करेंगे और चाहे बेरोजगार रहना पड़े लेकिन अकड़ नहीं जायेगी।"
मुकेश आगे बोला "हम जब जवान थे तो नॉकरी के लिए बहुत कुछ सुनते थे।"
राजू बोला "ये सब खान पान और संगति का असर है जो युवको को विन्रम रहने की जगह उग्र बना रहा है और इस हिसाब से तो आगे का समय और भी खराब होगा।"
मुकेश ने कहा "तुम बिलकुल सच कह रहे हो ना जाने आगे क्या समय आने वाला है?"
राजू और मुकेश भविष्य की सोच में खो गए।





































भलाई




नीलम ने देखा कि एक अधेड़ महिला खड़ी थी तो उसने सीट से उठकर उसे बिना बोले ही सीट दे दी। महिला भी बिना कुछ बोले सीट पर बैठ गई । नीलम को भी फीवर था लेकिन उसे बैठे रहना ठीक नही लगा । उसे मेट्रो ट्रेन में बड़ी मुश्किल से सीट मिली थी।
नीलम उसी महिला के सामने खड़ी थी। तभी अगला स्टेशन आया और महिला उतर गई। नीलम का ध्यान मोबाइल पर था इसलिय वह जब तक ध्यान देती एक व्यक्ति उस सीट पर बैठ गया।
नीलम को समझ नही आया, वह उस महिला के बारे में सोच रही थी की क्या उस महिला को उसे सीट वापिस ऑफर नही करनी चाहिए थी? दूसरा उसे एक स्टेशन के लिये क्या सीट लेनी चाहिए थी? नीलम के चेहरे पर मुस्कान थी और खड़ी हुई सोच रही थी क्या उसे आगे से किसी को अपनी सीट देनी चाहिए?

















































चिड़ियों का खाना



बीमार दादी को सुबह-सुबह बाहर जाते देख राजू ने उनसे पूछा, "दादी आप पहले ही बीमार हो इस हालात में कहाँ जा रही हो?" इस पर दादी थोड़ी रुकी और बोली "राजू में चिड़ियों को चबूतरे पर दाना डालने जा रही हूँ।"

"दादी यदि आप आज दाना डालने नहीं जाएंगी तो चिड़ियाँ मर नहीं जाएंगी, वो तो कहीं और भी खाना खा लेंगी।" राजू ने जवाब दिया। और आप ही अकेली थोड़ी हो दाना डालने वाली और भी तो लोग होंगे, वो डाल देंगे दाना। राजू ने कहा।

दादी ने कहा "राजू देखो हम लोग तो किसी तरह खाना खा लेंगे लेकिन वो पक्षी तो केवल हम पर ही निर्भर है।" राजू संतुष्ट नहीं था। दादी उसको थोड़ा दुलार करके चिड़ियों को दाना डालने चली गई।

 कुछ दिनों बाद राजू के घर में एक शादी थी उसकी वजह से घर में मेहमान आ गए थे। उसकी माँ और दादी मेहमानों की खातिरदारी में लग गई |अब वो राजू की तरफ ध्यान नहीं दे पाती थी।

एक दिन तो राजू को सुबह से शाम तक खाना ही नहीं मिला वो भाग कर अपनी दादी के पास गया और बोला "दादी देखो आप लोगों ने मुझे खाना ही नहीं दिया, भूख से मेरी हालत खराब है|" इस पर दादी बोली "राजू याद है जब तुमने मुझे चिड़ियों को दाना डालने जाने से मना किया था, हम तो इंसान है इसलिए मांग कर खा लेंगे लेकिन यदि कोई उन्हें दाना ना डाले तो वो किससे कहेंगे और तुम कह रहे थे की कोई और दाना डाल देगा तो तुम खुद देख लो की हमारे घर में सब लोग होते हुए भी तुम्हे खाना नहीं मिला तो उन बेचारे पक्षियों को तो कोई खाना देने वाला भी नहीं है|" राजू को समझ आ गई थी ।

उस दिन से राजू भी दादी के साथ दाना डालने जाने लगा।



























क्रिसमस का उपहार




"माँ, ये सांता सुना है सबको उपहार बाँटता है क्रिसमस पर?" छोटे बबलू ने टोकरी उठाती अपनी माँ से पूछा।
"हाँ बेटा ये उपहार देता है सबको, मैने भी सुना है लेकिन देखा कभी नही" माँ ने भी चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करते हुए कहा।
"माँ सांता से कहो की वो रोटी दे दे मुझे इस बार बहुत भूख लगी है" बबलू ने अपने नँगे पेट पर हाथ फेरते हुए कहा।
माँ ने चेहरे से दर्द को छुपाते हुए कहा "बेटा ये सिर्फ बाते है आज तक कोई ऐसा सांता नही बना जो गरीब को रोटी दे।" माँ ने बबलू के सिर पर हाथ रखा और भरी टोकरी लेकर ऊंची इमारत में चढ़ने लगी।
बबलू केवल प्रश्नवाचक निगाहों से माँ को देखता रहा।








































Purchase this book or download sample versions for your ebook reader.
(Pages 1-17 show above.)