include_once("common_lab_header.php");
Excerpt for काव्य-काँकरियाँ by , available in its entirety at Smashwords





प्रकाशक


वर्जिन साहित्यपीठ

78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,

नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043








सर्वाधिकार सुरक्षित

प्रथम संस्करण - मार्च 2018

ISBN







कॉपीराइट © 2018

वर्जिन साहित्यपीठ








कॉपीराइट


इस प्रकाशन में दी गई सामग्री कॉपीराइट के अधीन है। इस प्रकाशन के किसी भी भाग का, किसी भी रूप में, किसी भी माध्यम से - कागज या इलेक्ट्रॉनिक - पुनरुत्पादन, संग्रहण या वितरण तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक वर्जिन साहित्यपीठ द्वारा अधिकृत नहीं किया जाता।

काव्य-काँकरियाँ

(विविध रसों से सराबोर अगीत काव्य एवं गीति लघुकाओं का संग्रह)











लेखक

डॉ श्यामगुप्त







वर्जिन साहित्यपीठ

समर्पण


सभी काव्यानुरागी रसिकजनों को




















आभार


गीत व अगीत काव्य विधा के समस्त कवि,

साहित्यकार, आचार्य, सहयोगी और

सद्भावी विज्ञजनों का


































काव्य-काँकरियाँ की चुटीली भाव-तरंग



कंकड़ फैंकना एक सहज मानवी प्रवृत्ति है। कभी यूंही खेल खेल में अपनों पर या दूसरों पर। बचपन में पोखर-तालावों में, मेंढ़कों, पक्षियों, कुत्ते-बिल्लियों पर, पेड़ों पर फलों को तोड़ने हेतु ढेले फैंकना किसे नहीं सुहाया। बालिकाओं के आदि-खेल ‘कंकड़’ गुटके और बालकों के रंग-बिरंगे कंचों का खेल कौन नहीं जानता।


कंकड़ महिमा पुराण’ कोइ छोटा–मोटा पुराण नहीं है। गणेश चौथ पर कंकड़-युद्ध होता था (अब तो लोग भूल गए हैं केवल वाक्-कंकड़ फैंके जाते हैं)। हनुमानजी व उनके वानरों ने तो कंकडों के ‘महतो महीयान..’ रूप से बड़े बड़े युद्ध लड़ डाले और रामसेतु की रचना कर डाली। लोग स्वयं को कंकड़ भाव मानकर ‘कंकड़ भैयन तोर नहान सो मोर नहान‘ या ‘काँटा लगे कंकड़’ का नारा लगाते हैं। पार्वती जी तो ‘कंकड़ कंकड़ से मैं पूछूं शंकर मेरा कहाँ है’ गाती हुई वन वन ढूँढती रहीं उस आदि कंकड़ शंकर को। कबीर भी कहाँ पीछे रहे, कह गए, कंकड़ पत्थर जोरि के मस्जिद लाई चिनाय..’ और हाजियों को भी तो हज के दौरान मीना जाकर कंकड़ फैंकना अनिवार्य। ‘कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनवा जोड़ा’ भी प्रसिद्ध है। आँख की किरकिरी, राह का कंकड़, और खाने में कंकड़ आ जाए तो बात ही क्या। कंकड़ बीनते-बीनते मानव ने न जाने क्या क्या हीरे माणिक खोज लिए। सामान्य भाव में कंकड़, कण-कण है तो आत्ममुग्ध भाव में ‘कंकण किंकण नूपुर स्वर धुनि..’ का आभास है। कण-कण में भगवान भी रहते हैं। लघुतम रूप में कंकड़ – कण, एटम या आत्म होता है तो विभु रूप में परमात्म - अणो अणीयान, महतो महीयान..


ऐसा कौन है जिसने कभी दूसरे पर, किसी पर, किसी ओर, कहीं कोई कंकड़ फैंका ही न हो। हास्यकवि, विदूषक, नेताओं, राजनेताओं द्वारा एक दूसरे पर व्यंग्य-वाण रूपी कंकड़ फैंकना आज का प्रिय शगल है। अपने कान्हा जी तो कंकड़ फैंक कर दूध-दही-माखन की मटकियाँ फोड़ने में सिद्धहस्त थे। हो सकता है वे गोपियों पर एवं सभी गोप व सखा इसी बहाने अपनी अपनी गोपियों पर कंकड़ मारने के रस का आदान-प्रदान कर लेते हों। खैर कान्हा की कान्हा जी जानें, पर इस कांकरिया का सदा से ही प्रेमी-प्रेमिका के प्रेमपत्रों को अपने आप में लपेटकर आदान-प्रदान का सिलसिला बड़ा ही प्राचीन है व सशक्त माध्यम भी।


कविता कामिनी के रूप में भी ये कंकरियाँ शरीर के विभिन्न भागों पर भिन्न भिन्न प्रभाव डालती हैं। अपने-अपने आकार-प्रकार, फैंकने व खाने वाले के आपसी सम्बधानुसार व दोनों के मंतव्यानुसार तन व मन पर चोट करती हैं तथा विभिन्न प्रकार के रस, भाव, विभाव, अनुभाव का संचार करती हैं। कभी खबरदार, कभी होशियार करती हैं और जब कोई प्रेमरस से पगी ‘कंकरिया मार के जगाता’ है तो वे ‘फुल गेंदवा मारो मारो’ की भी रस निष्पत्ति भी करती हैं।


काव्य के मुक्तछंद अगीत या मुक्तक आदि छंद रूपी गीति लघुकाएं भी जब विभिन्न रस, भाव व सामाजिक सरोकार रूपी सौन्दर्य से युक्त होती हैं तो वे भी काँकरियों की भांति तन व मन पर चोट करती हैं और घायल तन मन में अतुकांत लयता व तुकांत युक्त संचारी भावों का उद्भव होता है। ये काव्य-काँकरियाँ कहीं सीख, कहीं भक्ति, कहीं रस-शृंगार, कहीं ओज कहीं हास्य-व्यंग्य आदि विभिन्न रसों से पगी होने पर श्रोता या पाठक के तन-मन को चुटीला करके विभिन्न रसों के भाव, विभाव व अनुभावों का संचार करती हैं।


प्रस्तुत काव्य संग्रह “काव्य काँकरियां” इसी प्रकार की विभिन्न छंद, सुर, ताल, लय, विषय-भावों व रसों से पगी व सनी अगीत छंद व लघु गीतिछंद, अतुकांत व तुकांत लघुकाओं का संग्रह है, जो कभी सरस बनकर तन मन को छेडती हैं तो कभी अंतरतम को झिंझोड़ती हैं। कभी नीति बनकर आत्मबोध कराती हैं तो कभी भक्ति रस का संचार। ये बड़ी-छोटी, लघु-विभु, महीन-मोटी, गोल-चिकनी, गढ़-अनगढ़, टेडी-मेडी, हल्की-भारी, तीब्र-सौम्य, खट्टी-मीठी-कड़वी, चुटीली, रसीली, सुरीली, लजीली, हठीली, नशीली काँकरियाँ श्रोताओं व पाठकों के तन मन पर विभिन्न प्रकार से प्रहार करेंगी एसा मेरा विचार है एवं मन को सुखानुभूति तथा त्रिविधि शान्ति प्रदान करेंगी। “मानो तो शंकर (शांतिकारक) हैं कंकर (चोटिल कारक) है अन्यथा”। शेष तो पाठक, विज्ञ जन, साहित्यकार, समीक्षक ही बताएँगे कि किसको और कितनी काँकरियाँ कहाँ-कहाँ लगीं व चुभीं और क्या-क्या रस संचार कर पाईं। इसके लिए मैं सभी घायल तन-मन जनों से पहले ही क्षमा मांग लेता हूँ..

घायल की गति घायल जाने

और जाने कोय


(डॉ श्यामगुप्त)


























डॉ श्यामगुप्त (चिकित्सक)

(चिकित्सा व साहित्य जगत में जाना-पहचाना नाम)


मोब. ९४१५१५६४६४; दूरभाष: ०५२२-२४२५४७५

ईमेल: drgupta04@gmail.com




शल्य-चिकित्सक व साहित्यकार डॉ श्यामगुप्त का पूरा नाम ड़ा. श्यामबाबू गुप्ता है। चिकित्सा क्षेत्र में वे डॉ एस बी गुप्ता के नाम से जाने जाते हैं।


जीवन-परिचय: डॉ श्यामगुप्त का जन्म पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्राम मिढाकुर, जिला आगरा में १० नवंबर १९४४ में हुआ। आपके पिता का नाम स्व जगन्नाथ प्रसाद गुप्त व माता का नाम स्व श्रीमती रामभेजी देवी हैं। पत्नी का नाम श्रीमती सुषमा गुप्ता है, जो हिन्दी में स्नातकोत्तर व स्वयं भी एक कवयित्री व गायिका हैं।


शिक्षा: डॉ श्यामगुप्त की समस्त शिक्षा-दीक्षा आगरा में ही हुई। सेंटजांस स्कूल (आगरा), राजकीय इंटर कॉलेज, आगरा व सेंटजांस डिग्री कॉलेज आगरा से अकादमिक शिक्षा के उपरांत इन्होंने सरोजिनीनायडू चिकित्सा महाविद्यालय, आगरा (आगरा विश्वविद्यालय) से चिकित्साशास्त्र में स्नातक की उपाधि (एमबीबीएस) व शल्य-क्रिया विशेषज्ञता में स्नातकोत्तर (मास्टर आफ सर्जरी) की उपाधि प्राप्त की। इस दौरान देश-विदेश की चिकित्सा पत्रिकाओं व शोध-पत्रिकाओं में उनके चिकित्सा-आलेख व शोध आलेख प्रकाशित होते रहे। चिकित्सा महाविद्यालय, आगरा में दो वर्ष तक रेज़ीडेंट-सर्जन के पद पर कार्य के उपरान्त आप भारतीय रेलवे के चिकित्सा विभाग में देश के विभिन्न पदों व नगरों में कार्यरत रहे एवं उत्तर रेलवे मंडल चिकित्सालय, लखनऊ से वरिष्ठ चिकित्सा अधीक्षक के पद से सेवा निवृत्त हुए।


साहित्यिक गतिविधियाँ: धर्म, अध्यात्म के वातावरण - रामायण के सस्वर पाठ से दिनचर्या प्रारम्भ करने वाली व चाकी-चूल्हे से लेकर देवी-देवता, मंदिर की पूजा अर्चना करने वाली माँ तथा झंडा गीत व देशभक्ति के गीतों के गायकों की टोली के नायक, देशभक्ति व सर्वधर्म समभाव भावना प्रधान पिता के सान्निध्य में बाल्यावस्था में ही कविता-प्रेम प्रस्फुटित हो चुका था। शिक्षाकाल से ही आगरा नगर की पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ व आलेख प्रकाशित होते रहे। आगरा से प्रकाशित "युवांतर" साप्ताहिक के वे वैज्ञानिक सम्पादक रहे एवं बाद में लखनऊ नगर से प्रकाशित "निरोगी संसार" मासिक के नियमित लेखक व सम्पादकीय सलाहकार रहे।


आप हिन्दी, ब्रजभाषा अंग्रेज़ी भाषाओं के साहित्य में रचनारत हैं। हिन्दी साहित्य की गद्य व पद्य, दोनों विधाओं की गीत, अगीत, नवगीत, छंदोवद्य-काव्य, ग़ज़ल, कथा-कहानी आलेख, निबंध, समीक्षा, उपन्यास, नाटिकाएं - सभी में वे समान रूप से रचनारत हैं। अनेक काव्य रचनाओं के वे सहयोगी रचनाकार हैं व कई रचनाओं की भूमिका के लेखक भी हैं। अंतरजाल (इंटरनेट) पर विभिन्न ई-पत्रिकाओं के वे सहयोगी रचनाकार हैं। श्याम स्मृति - The world of my thoughts, साहित्य श्याम, हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान व विजानाति-विजानाति विज्ञान उनके स्वतंत्र चिट्ठे (ब्लॉग) हैं एवं कई सामुदायिक चिठ्ठों के सहयोगी रचनाकार व सलाहकार हैं।

डॉ गुप्त ने कई नवीन छंदों की सृष्टि भी की है। उदाहरणार्थ, अगीत विधा के लयबद्ध अगीत, षटपदी अगीत, त्रिपदा अगीत, नव-अगीत छंद त्रिपदा अगीत ग़ज़ल तथा गीति विधा के "श्याम सवैया छंद" पंचक सवैया श्याम घनाक्षरी आदि


प्रकाशित कृतियां: काव्य-दूत, काव्य निर्झरिणी, काव्यमुक्तामृत (सभी काव्य-संग्रह), सृष्टि - अगीत विधा महाकाव्य, प्रेम काव्य - गीति-विधा महाकाव्य, शूर्पणखा - अगीत-विधा काव्य-उपन्यास, इन्द्रधनुष उपन्यास - नारी विमर्श पर एवं अगीत विधा कविता के विधि-विधान पर शास्त्रीय-ग्रन्थ "अगीत साहित्य दर्पण, ब्रजभाषा में काव्य संग्रह ‘ब्रजबांसुरी’ एवं शायरी संग्रह ‘कुछ शायरी की बात होजाए’ अगीत-त्रयी, तुम तुम और तुम (गीत संग्रह) ईशोपनिषद का काव्य-भावानुवाद अदि १३ कृतियाँ प्रकाशित हैं।


सम्मान, पुरस्कार अलंकरण आदि:


. .रा.का.., राजभाषा विभाग (उप्र) द्वारा राजभाषा सम्मान (काव्य संग्रह काव्यदूत व

काव्य-निर्झरिणी हेतु)


. अभियान जबलपुर संस्था (.प्र.) द्वारा हिन्दी भूषण सम्मान (महाकाव्य ‘सृष्टि’ हेतु)


. विन्ध्यवासिनी हिन्दी विकास संस्थान, नई दिल्ली द्वारा बाबा दीप सिन्घ स्मृति सम्मान


. .भा. अगीतपरिषद द्वारा श्री कमलापति मिश्र सम्मान व अ.भा. साहित्यकार दिवस पर

पं. सोहनलाल द्विवेदी सम्मान


. .भा. अगीत परिषद द्वारा अगीत-विधा महाकाव्य सम्मान (अगीत-विधा महाकाव्य

सृष्टि हेतु)

. जाग्रति प्रकाशन, मुम्बई द्वारा साहित्य-भूषण एवं पूर्व पश्चिम गौरव सम्मान


. इन्द्रधनुष संस्था बिज़नौर द्वारा काव्य-मर्मज्ञ सम्मान


. छ्त्तीसगढ शिक्षक साहित्यकार मंच, दुर्ग द्वारा हिरदे कविरत्न सम्मान


. युवा कवियों की संस्था ‘सृजन’ (लखनऊ) द्वारा महाकवि सम्मान एवं सृजन-साधना वरिष्ठ

कवि सम्मान


१०. शिक्षा साहित्य व कला विकास समिति, श्रावस्ती द्वारा श्री ब्रज बहादुर पांडे स्मृति

सम्मान


११. .भा. साहित्य संगम, उदयपुर द्वारा राष्ट्रीय-प्रतिभा-सम्मानशूर्पणखा काव्य-उपन्यास

हेतु 'काव्य-केसरी' उपाधि


१२. जगत सुन्दरम कल्याण ट्रस्ट द्वारा महाकवि जगत नारायण पांडे स्मृति सम्मान


१३. विश्व हिन्दी साहित्य सेवा संस्थान, इलाहाबाद द्वारा ‘विहिसा-अलंकरण-२०१२....आदि


१४. हिन्दी साहित्य मंच (ई पत्रिका) द्वारा काव्य सम्मान


१५. बिसारिया शिक्षा एवं सेवा समिति, लखनऊ द्वारा ‘अमृत-पुत्र पदक


१६. कर्नाटक हिन्दी प्रचार समिति, बेंगालूरू द्वारा सारस्वत सम्मान (‘इन्द्रधनुष’ उपन्यास

हेतु)


१७. उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ व कर्नाटक हिन्दी प्रचार समिति द्वारा राष्ट्रीय गोष्ठी

वक्ता पुरस्कार


१८. युवा रचनाकार मंच द्वारा डॉ अनंत माधव चिपलूणकर स्मृति सम्मान - २०१५


१९. साहित्यामंडल श्रीनाथ द्वारा द्वारा हिन्दी साहित्य विभूषण की उपाधि २०१५


२०. अंतर्जाल पर साहित्य रचना हेतु डॉ रसाल स्मृति शोध संस्थान द्वारा रवीन्द्र शुक्ल स्मृति

पुरस्कार


२१. अखिल भारतीय मतदाता परिषद् द्वारा समाज भूषण सम्मान २०१७


२२. नव सृजन संस्था लखनऊ द्वारा साहित्याचार्य की उपाधि २०१७




शोध: लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा ‘डा श्यामगुप्त के व्यक्तित्व व कृतित्व’ पर शोध

सम्पर्क: डा श्यामगुप्त, सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, के-सेक्टर, लखनऊ-२२६०१२, उत्तरप्रदेश



























प्रस्तुत काव्य संग्रह “काव्य-काँकरियाँ” विभिन्न छंद, सुर, ताल, लय, विषय-भावों व रसों से पगी व सनी अगीत छंद व लघु गीतिछंद, अतुकांत व तुकांत लघुकाओं का संग्रह है, जो कभी विविध सरस भावतरंग बनकर तन-मन को छेडती हैं तो कभी अंतरतम को झिंझोड़ती हैं। कभी नीति बनकर आत्मबोध कराती है, तो कभी भक्ति रस का संचार करती है। इन लघुकाओं को रचनाकार ने कांकरियाँ का नाम दिया है।


हिन्दी व ब्रजभाषा के लब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार, कवि, लेखक, कथाकार, उपन्यासकार, समीक्षक तथा सृष्टि एवं प्रेम-काव्य जैसे वैज्ञानिक, वैदिक तथा दार्शनिक महाकाव्य, पौराणिक व महिला सशक्तिकरण पर शूर्पणखा काव्य-उपन्यास व इन्द्रधनुष उपन्यास, अगीत साहित्य दर्पण जैसी शास्त्रीय छंद विधान रचना एवं ब्रजभाषा में ब्रज-बांसुरी काव्य और उर्दू काव्य-कला पर ‘कुछ शायरी की बात हो जाए’ एवं ‘तुम, तुम और तुम’ शृंगार गीत संग्रह तथा मानव आचरण पर वैदिक दृष्टि का सरल काव्यमय प्रस्तुतीकरण, ‘ईशोपनिषद का काव्य-भावानुवाद’ जैसी कृतियों के रचयिता डॉ श्यामगुप्त द्वारा रचित प्रस्तुत कृति काव्य-कांकरियाँ पाठको के सम्मुख प्रस्तुत है।


प्रकाशक

























अगीत काँकरियाँ


खंड ()










वंदना

मेरे ये अगीत हे प्रभुवर!

गीत भाव युत तेरे ही स्वर।

जगमग अलख अगीत हित जगे,

तेरी भक्ति भावना मन में।

श्याम करे अर्चन अर्पण प्रभु!

तूने ही जो मुझे दिया है।।

विघ्न विनाशक सिद्धि प्रदाता,

हे गणेश! गणपति, गणनायक।

मुझको अपनी कृपा भक्ति दें,

भारत माँ की वंदना करूँ।

हरो विघ्न सारे ही जग के,

श्याम कर सके राष्ट्र वंदना।।

भारत माँ वंदन करने को,

तेरे दर पर मातु शारदे!

साष्टांग मैं करूं दंडवत,

हे माँ! शौर्य कलम में भर दो।

सरस्वती कलहंस विराजनि,

जग को दें सुबुद्धि जग के हित।।


















अतुकांत काव्य कांकरियाँ


अगीत





.


शिवं भवेत्


कपडे जूते मेकअप

सब महंगे हो जाएंगे।

बज़ट के बाद

लोग सिर्फ लंगोटी अपनायंगे

तन पर लगायेंगे भभूत

हो जाएंगे सब अवधूत

और दिगंबर;

पक्के औघड़ भक्त हैं

हमारे मान्यवर।





















.


सही बातें


अठारह वर्ष प्राचीन

खोपड़ी में

कोइ मानसिक बीमारी नहीं थी,

अर्थात

मनु व आदम की कही

सारी बातें

सही थीं।































.


चोरी


कविवर दोषी जी ने

थाने में रिपोर्ट लिखाई,

मेरा सौ का नोट

चोरी होगया है भाई।

थानेदार झल्लाया,

मंच का झूठ

थाने तक क्यों ढोते हैं,

कवि के पास भी

कहीं सौ के नोट होते हैं|
















Purchase this book or download sample versions for your ebook reader.
(Pages 1-28 show above.)