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Excerpt for बातें कुछ अनकही सी by , available in its entirety at Smashwords


बातें

कुछ अनकही सी

(काव्य संग्रह)








लेखिका

माला झा





वर्जिन साहित्यपीठ


प्रकाशक


वर्जिन साहित्यपीठ

78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,

नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043







सर्वाधिकार सुरक्षित

प्रथम संस्करण - मार्च 2018

ISBN







कॉपीराइट © 2018

वर्जिन साहित्यपीठ








कॉपीराइट


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ऐ मेरे हमसफर!



चाहा है तुमने मुझे हर रंग में, हर रूप में

साथ दिया है तुमने मेरा हर छाँव में, हर धूप में

सोचती हूँ लेकिन कभी यूँ ही बैठकर

मेरे हमसफ़र!

जब जिंदगी की गोधूली बेला आएगी

चेहरे पर झुर्रियां और बालो में सफ़ेदी छाएगी

जब मेरे अधर होंगे गुलाबों जैसे

आँखें होंगी गहरी झील जैसी

क्या तुम तब भी इन आँखों में खो जाओगे?

क्या अधरों पर प्रेम चिन्ह दे पाओगे?

क्या कई दिनों से उलझी जुल्फों को सुलझा पाओगे ?

सोचती हूँ बस यूँ ही बैठकर

मेरे हमसफर!

क्या उम्रभर मेरा साथ निभाओगे?





























नवनिर्माण



चलो जीवन का नवनिर्माण करें

इसकी खुशियों का रसपान करें



जीवन की इस पथरीली राहों में,

कौन छूट गया, कौन रूठ गया,

कौन साथ दिया, कौन भूल गया,

क्यों व्यर्थ की बातों का हम ध्यान करें,

चलो जीवन का नवनिर्माण करें।



जो था एक सुहाना सपना,

जो हो सका कभी अपना,

उन सपनों का क्यों गुणगान करें,

चलो जीवन का नवनिर्माण करें।



माना सदियाँ गुजर गई,

इन खुशियों को पाने में,

अब जो मिली है ये खुशियां,

क्यों इसका हम मान करें।

चलो नवनिर्माण करें, चलो नवनिर्माण करें।

जीवन की खुशियों का रसपान करें।

















माँ



याद आती हो माँ, बहुत याद आती हो

ज़िन्दगी के हर सबक में तुम बहुत याद आती हो

जब रोटी का निवाला लिए अपने बच्चे के पीछे भागती हूँ।

वो झटकता रहता है मै फिर भी खिलाती रहती हूँ।

जब नींद से बोझिल आँखों से रातों में जागती हूँ।

लोरी की हर धुन पर बस तुम याद आती हो......

माँ, तुम बहुत याद आती हो।



जब ठोकर उसे लगती है और दर्द मैं सहती हूँ।

उसके लिए रोज नए सपने मैं बुनती हूँ।

उसकी राहों में बिछे कांटे चुनती रहती हूँ।

ज़िन्दगी की हर ठोकर पर बस तुम याद आती हो.....

माँ, तुम बहुत याद आती हो।



जब भी उसे गले लगाना चाहती हूँ और वह बंधनमुक्त हो जाता है।

जब भी ज़माने का दस्तूर समझाना चाहती हूँ और वह बेपरवाह हो जाता है।

नए और पुराने ज़माने की तकरार में बस तुम याद आती हो.....

माँ, तुम बहुत याद आती हो।



छत पर तेरे आँचल की ओट से चाँद को तकना।

तेरी गोदी में सर रखकर यूँ ही लेटे रहना।

छत में, आँगन में, घर के हर कोने में

मेरी यादों के हर गलियारे में बस तुम याद आती हो


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(Pages 1-19 show above.)