include_once("common_lab_header.php");
Excerpt for अनुभूतियाँ (काव्य संग्रह) by , available in its entirety at Smashwords



प्रकाशक

वर्जिन साहित्यपीठ
78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,
नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043





सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करण - अप्रैल 2018
ISBN




कॉपीराइट © 2018
वर्जिन साहित्यपीठ






कॉपीराइट

इस प्रकाशन में दी गई सामग्री कॉपीराइट के अधीन है। इस प्रकाशन के किसी भी भाग का, किसी भी रूप में, किसी भी माध्यम से - कागज या इलेक्ट्रॉनिक - पुनरुत्पादन, संग्रहण या वितरण तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक वर्जिन साहित्यपीठ द्वारा अधिकृत नहीं किया जाता।

अनुभूतियाँ
(काव्य संग्रह)






कवि
नीलाक्ष शुक्ला


















नीलाक्ष शुक्ला

निवास: राजेन्द्र नगर, बरेली, उत्तर प्रदेश

मो. 9412738182

शिक्षा: स्नातक एवं डिप्लोमा - मार्केटिंग, सेल्स

कार्यक्षेत्र: ओटोमोबाईल इन्डस्ट्री

साहित्यिक उपलब्धि: 250-300 के लगभग कविताएं और 15-20 लघु कथाएं। एक किताब भी प्रकाशित हो चुकी है।











































रावण



ढोल बाजे और नाद

कर रहे उन्माद

मध्य मै हूँ खडा

जैसे धरती में हूं गढा

मैं खडा शान्त

मेरे दरम्यान सब अशांत

वर्ष दर वर्ष प्रति वर्ष

बढ रहा मेरा कद

वर्तमान युग में

बौने होते राम

मेरे समक्ष

कहां इतने दक्ष

जो लगाएं मेरे कद पर विराम

मै प्रतीक

मै कालातीत

कर रहा वास

हर मस्तिष्क मेरा निवास

होना चाहता मैं मुक्त

करना चाहता विश्राम

जागृत हो कोई राम

लगाए मेरे कद पर विराम।





























जयद्रथ वध



अभिमन्यु वध से शोक सतत

लेकर प्रण जयद्रथ वध का

अश्रु स्वेद रक्त से लथपथ

चल पडा वह अग्नि पथ



मुख है रक्त सा लाल

जैसे हो अग्नि का थाल

कारण बना हुआ है मूल

जैसे चुभा ह्दय कोई शूल



करता प्रतिज्ञा पार्थ मै

गर हुआ अस्त रवि पूर्व तो

अस्त्र सब त्यागू गा मै

अभिमन्यु शव के अनल को

स्वयं फिर धारुं गा मै



जयद्रथ ने खेल जो खेला

तृतीय पहर की आई बेला

अपने वचन के कारण फिर

अर्जुन पडने लगा अकेला।



तब आई छलिए की बारी

जिस से हारी सृष्टि सारी

चक्र चला जो आशातीत

लगने लगी रात्रि प्रतीत



रात्रि का वह स्वांग देख

कायर स्वयं प्रकट हुआ

बाण चला कर अर्जुन ने

अपना प्रण है पूर्ण किया।









मौसम



फूल खिले आया बसंत

हुआ एक विषाद का अंत।

नया सवेरा नयी उमंग

कण कण मे भर गयी तरंग।



आती जब गरमी की बेला

संघर्षों का अजब यह रेला।

तपती भूमि बढती तृष्णा

जीवन का दर्शाती मेला।



फिर आती भीनी बरसात

मिट जाते पिछले अवसाद ।

जीवन मे आता ठहराव

कुछ ऐसा होता है यह पडाव।



सरदी होता अंतिम पडाव

हो जाते शान्त सब भाव।


Purchase this book or download sample versions for your ebook reader.
(Pages 1-7 show above.)