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Excerpt for काव्य मञ्जूषा (काव्य संकलन) by , available in its entirety at Smashwords



प्रकाशक

वर्जिन साहित्यपीठ
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नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043
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सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करण - अप्रैल 2018
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वर्जिन साहित्यपीठ





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काव्य मञ्जूषा
(काव्य संकलन)






संपादन मंडल
ललित मिश्र और ममता शुक्ला








समर्पण


स्वर्गीय श्री ताराकांत मिश्र

श्रीमती मंजुला मिश्र

श्रीमती सोनी मिश्र

उत्कर्ष मिश्र










मरद अब दूसरी औरत ले आया है

मिथिलेश कुमार राय


मरद अब दूसरी औरत ले आया है
पहली औरत
पाँच बेटियाँ जनने के बाद
दरवाजे पर बँधी पशुओँ संग
अपना दिल लगाने लगी है
मरद जब भी उसे टोकता है
उसकी आवाज कर्कश होती है
एक छोटे से वाक्य मेँ
कई तरह की भद्दी गालियाें मेँ
मरद उसे रोज बताता है
कि उसकी किस्मत कितनी फूटी हुई है

यह सब देखती-सुनती पहली औरत
चुपचुप अपना माथा धुनती रहती है
और विधाता को कोसती रहती है
लोगोँ ने उसे कुछ भी बोलते बहुत कम सुना है
रोते बहुत देखा है

दूसरी औरत गर्भ धारण नहीँ करती
जैसे ही उसका मासिक ठहरता है
वह अजीब-अजीब हरकतेँ करने लगती है
जैसे वह अपने खाने मेँ
तीखी मिर्ची की मात्रा बढ़ा देती है
वह सुपारी की जगह
लहसून चूसने लगती है
कभी भी अचानक से सीढ़ियोँ से फिसल जाती है
रक्त-स्राव के बाद ही
उसकी हरकतेँ सामान्य हो पाती हैँ
मुसकुराती हुई
वह डायनोँ को दो-चार गालियाँ देती है
और जब मरद नहीँ होता
पहली औरत की बाँहोँ मेँ समाकर
फूट-फूटकर रोने लगती है
अस्फुट शब्दों में वह कहती है कि
मैं कभी उर्वर होना नहीं चाहती


























दूध के भ्रम में मैं माँ का माँस चूसा करता

मिथिलेश कुमार राय



कूड़े के ढेर पर
मैं दूध ही ढूंढ़ा करता हूँ

मेरे गाल पिचके हुए हैं
मेरी आँखें अंदर, बहुत अंदर तक धँस गई हैं
मैं ज्यादा देर तक कहीं खड़ा रहता हूँ तो
मेरी टांगें काँपने लगती हैं
जरा कड़क के बोल देता है कोई सामने
तो मैं सर्दी में भी पसीने से नहा उठता हूँ

मेरा पेट कितना बढ़ गया है
मेरी छाती कितनी धँस गई है
मेरा चेहरा बे-पानी क्यों दिखता है
मेरे बदन का रंग काला है
मेरे दाँत काले-काले होकर
अब हिलने लगे हैं
जब कभी भी मैं दर्द से बेहाल-बेहाल हो उठता हूँ

मैं जन्मा था तो
मेरी माँ के स्तन से दूध कहाँ चला गया था
मैं घंटों स्तन मुंह में लिए
ईश्वर से कंठ तर हो जाने की प्रार्थना किया करता था
माँ शायद अन्न के लिए कोई मंत्र बुदबुदाती रहती थीं
मैं दूध के भ्रम में
माँस को चूसा करता था
मेरा बचपन बिना दूध के बीता है

मैं कूड़े के ढ़ेर पर
दूध ही ढूंढ़ा करता हूँ






























जैसे स्त्रियां नइहर लौटती हैं

मिथिलेश कुमार राय



जैसे स्त्रियां नइहर लौटती हैं
और बिना घूंघट के घूमती हैं पूरा गांव
वे खेत तक बेधड़क जाती हैं
वहां कोई चिड़िया फुर्र से उड़ती है
तो उसे वे देखती हैं
दूर तक आकाश के उस छोर तक

जैसे वे बात-बात पर मुसकाती हैं
और किसी भी बात पर खिलखिलाने लगती हैं

नइहर लौटते ही जैसे
देह को लगने लगता है पानी
फेफड़े को स्वच्छ हवा मिलने लगती है
और भूख बढ़ जाती है इतनी
कि दिन में तीन-तीन बार खाने का मन करने लगता है

कि जैसे पीलापन झड़ने लगता है
और कोंपलें फूट पड़ती हैं
जैसे वे मनपसंद गहने बनवाने के लिए
सुनार के पास बैठ जाती हैं घंटों
कि जैसे शाम की चिंता उन्हें
उतना नहीं सताती
चेहरे पर पसर जाती है निश्चिंतता
वे बेफिक्र हो जाती हैं

ठीक ऐसे ही लौटता है परदेसी
कि वह लौटता है तो उसके साथ ही
घर की मुस्कुराहट भी लौट आती है
और देह का हरापन भी लौट आता है
कि लौटता है परदेसी
तो सड़क से सूनापन भाग जाता है
और तब रात भी आती है तो
कोई डर नहीं रह जाता है

ऐसे ही लौटता है परदेसी
कि जब भी वह लौटता है
बिना बात के कोई त्योहार हो जाता है





















मुझे अपनी जरूरतें पसंद हैं

ललित कुमार मिश्र



मैं तुम्हें चाहता हूँ या नहीं

नहीं जानता

किन्तु रात को जब तुम्हारी ओर

करवट लेता हूँ

और मेरे हाथ तुम्हारा स्पर्श नहीं पाते हैं

तो मैं चौंक जाता हूँ

मेरी आँखें खुल जाती हैं

और तलाशने लगती है तुम्हें

चारों तरफ

मुझे तुम्हारी कमी महसूस होती है या नहीं

नहीं जानता

किन्तु मित्रों के लाख कहने पर भी

किसी पार्टी या पिकनिक पर नहीं जाता

बाज़ार का कोई भी आकर्षण

मुझे बांध नहीं पाता

ऑफिस से निकलते ही

बस दौड़ पड़ता हूँ

घर की ओर

मैं तुम्हें मानता हूँ या नहीं

नहीं जानता

पर जब तुम किसी चीज की

डिमांड करती हो

और मैं उसे चाहकर भी पूरा नहीं कर पाता

तो मैं अपने सामर्थ्य को

बढ़ाने में जुट जाता हूँ

जी जान से

मैं तुम्हें ठीक से जान पाया या नहीं

नहीं जानता

पर इतना अवश्य कह सकता हूँ

कि मैं जब जब कहीं दूर

बल्कि बहुत दूर

जाने के लिए कदम बढ़ाता हूँ

मेरी आँखों से आँसू बरसने लगते हैं

कदम कांपने लगते हैं

मन अशांत हो जाता है

मेरी ज़िंदगी में तुम क्या मायने रखती हो

नहीं जानता

पर इतना अवश्य जानता हूँ

कि हार और जीत के द्वंद्व में

मैं जब जब गिरता या उठता हूँ

मेरी निगाहें तुम्हें ही तलाशती हैं

हाँ, यह सच है

मैं नहीं जानता

प्रेम और जरुरत में फर्क

किन्तु यह भी सच है

कि तुम मेरी जरुरत हो

और मुझे

अपनी जरूरतें पसंद हैं



















शायद कोई पागल रहा होगा

गौरव भारती



एक अधेड़ इंसान

लंगड़ाते हुए चल रहा था

चलते चलते रुक रहा था

लगा रहा था हिसाब

अपनी गंदी, लंबी सिकुड़ी उँगलियों पर

न जाने किस चीज का

मैंने रूककर पूछा -

क्या गिन रहे हो’

उसने मुझे ऊपर से नीचे तक टटोला

मेरी खद्दर झोली पर आँख गड़ाए

मुँह चबाते हुए बोला -

दिखता नहीं क्या

सड़क नाप रहा हूँ

दूर-दूर तक फैली सड़क

लंबी-चौड़ी सड़क

रोज नापता हूँ

मेरे साथ नापोगे तुम भी

रहने दो तुमसे न होगा’

मैले, बेतरतीब बाल खुजाते हुए

रूककर उसने एक सवाल पूछा -

लेखक हो क्या?

मैंने हँसकर कहा -

हां, लिख लेता हूँ, कोशिश में हूँ

लेकिन तुमने कैसे पता लगाया’

सवाल काटते हुए उसने फिर पूछा -

किस जमात के लेखक हो?

मने किसके लिए लिखते हो?

कौन-सा झंडा?’

अकबकाते हुए मैंने कहा -

सबके लिए लिखता हूँ

लेखक हूँ, नेता नहीं’

उसने हँसते हुए कहा -

फिर दो कौड़ी के लेखक हो तुम

चलो, मेरी तरह सड़क नापोगे?

बहुत मजा आएगा’

मैं चिढ गया

थोड़ा खुद को सँभालते हुए

उम्मीद की मोमबत्ती जलाई

और बोला - ‘एक दिन मुझे पढ़ा जाएगा

तुम देख लेना

अच्छे पाठक जिन्दा हैं अभी

वे पढ़ेंगे मुझे

तुम देख लेना’

उसने एक सलाह दी

अपने गाल को लंबे नाखूनों से खुजाते हुए

हँसते हुए बोला -

कोई झंडा थाम लो’

मैंने पूछा –

तिरंगा?’

उसने कहा - ‘वो तो दो रूपए में मिलता है’

उसने कहा - ‘अरे कोई भी,


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