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वर्जिन साहित्यपीठ
78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,
नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043





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प्रथम संस्करण - अप्रैल 2018
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बिक रही हैं बेटियाँ
(काव्य संग्रह)






लेखक
कुमार प्रकाश











प्रकाश कुमार प्रजापति

उपनाम: 'कुमार'



8800586410, 7678900169

prakash15a@gmail.com



जन्मस्थान: ग्राम - दरेखू, जिला - वाराणसी, उप्र



लेखन विधा: गीत, गजल, एवं कविताएँ



प्रकाशित रचनायें: विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में, विशेष कर अमर उजाला काव्य पटल।



मैं प्रकाश कुमार (कुमार प्रकाश) वाराणसी जिले के एक छोटे से गाँव दरेखू का निवासी हूँ। प्रारम्भिक शिक्षा वाराणसी में ही प्राप्त किया तत्पश्चात इंजिनियरिंग की पढ़ाई के लिये बरेली गया और वहाँ श्री राम मूर्ति कालेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नॉलॉजी से मेकैनिकल ब्रांच में स्नातक किया।

गुड़गांव में कुछ दिनों तक निजी संथान में काम किया वहाँ मजदूरों की दयनीय स्थिति देखकर बहुत कष्ट होता था और उसी ने मुझे लिखने के लिये प्रेरित किया। मैं अपने घर में सात भाइयों के बीच पांचवें नम्बर पर हूँ। पिता जी स्वयं लोक गीत (बिरहा एवं कजरी )गाते एवं लिखते हैं और माता जी गृहणी है। लेखन की विरासत मुझे पिता जी से ही मिली और उनके दिशा निर्देश में ही मैंने समाजिक पहलुओं पर लिखना आरम्भ किया। लेखन क्षेत्र में विगत चार वर्ष से शक्रीय हूँ और कुछ एक कवि सम्मेलन में भी शिरकत करने का अवसर प्राप्त हुआ। आगे भी समाजिक पहलुओं और कुंठाओं को केंद्र में रखकर रचनायें लिखता रहूंगा।

उम्मीद करता हूँ कि मेरी रचनायें आप सभी पाठकजन को पसंद आयेंगी और आप सबका भरपूर प्यार मिलेगा।























पगडंडी



पगडंडी गाँव की मैं

मैं पगडंडी गाँव की

थोड़ी सी लहराती सी

थोड़ी सी बलखाती सी

कहीं पर पतली संकरी

कहीं हूँ उठती गिरती

कितने पैरों को मैं चूमूँ

कुछ पैर महावर डूबे

कुछ पैर बिवाई फूटे

कोई चले है इतराकर

कोई चले है शरमाकर

चलते हैं कितने इंसान

बूढ़े बच्चे और जवान

संस्कार लिये पुरुखो के

आँचल चूमूँ मैं खेतों के

मैं सिखलाती सम्भलना

बिन वैशाखी के चलना

कदम न कोई डिगने पाये

जो डिगे मुझ तक आये

जो भी मुझको माप लिये

कदम वही जग नाप लिये।

मैं तन्हा अकेला एक पथिक

राह तू हमराही बन के चल

चल चलें सुनाते एक दूजे को

एक दूजे की तन्हा कहानी

क्या पता ऐसे ही बन जाये

हम एक दूजे के साथी भी

किसे खबर कब तक चले

हम दोनों का ही ये सफर

मैं तो ठहरा एक पथिक

हूँ साथ तभी तक मैं तेरे

है जब तक मंजिल मेरी दूर

साथ छोड़कर चल दूंगा मैं

मंजिल की बाहों में खोने

मगर समझ न तू बेवफा

है जीवन का यही चलन

मिलना, मिलकर बिछड़ना,

आज मैं हूँ कल होगा और

उसके होंगे अपने कुछ तौर

तेरे संग चलेगा कुछ दिन

फिर चल देगा कहीं ओर।





















वृक्षारोपण आवश्यक है



ये कैसा खेल रचा डाला

सब कुछ ही रेल बना डाला

अब जीवन रास नहीं आये

सोचो क्यों सांस नहीं आये

जीना अब भारी लगता है

कोई लाचारी लगता है

रोग की मार बढ़ती जाये

दाम दवा की चढ़ती जाये

कोई कैसे उपचार करें

बस खुद को ही धिक्कार करें

सोचो रोग कहाँ से आये

कौन है जो दावत भिजवाये

जहाँ तहाँ किसने फैलाया

कूड़ों का इतना ढेर लगाया

प्लास्टिक का उत्पादन किया

और प्रदूषण को खाद दिया

क्या किसी तराजू तौला है

जो जहर हवा में घोला है

सब ही मोटर दौड़ाते हैं

सब इसमें शान दिखाते हैं

ये बड़े बड़े कल कारखानें

प्रदूषण को लगे रह दिखाने

जितना कचरा इनसे निकले

अपनी नदियों में जा मिले

अपना ही जोआस्तित्व खोये

ये नदियाँ फिर क्यों ना रोये

वन भी सारे अब कटते जाते

ऊँची इमारत बस बनते जाते

प्राण वायु की कमी हुई है

धरती कैसे थमी हुई है

बस कोई गुब्बार दिखता है

मनुजता की हार दिखता है

ये कैसा अजब फ़साना है

ये गगन हुआ वीराना है

क्यों पंक्षी नजर नहीं आते

अब कोयल राग नहीं गाते

सूरज भी तपकर लाल हुआ

अब जीना बहुत मुहाल हुआ

अपने हाल पर रोती जाय

धरती हरियाली खोती जाय

अब तो कुछ इसका ध्यान करो

प्रकृति का जरा सम्मान करो

हवा पानी स्वच्छ मिलेगा

जीवन ये फिर हँसे खिलेगा

कूड़े पर कुछ रोक लगाओ

जरा प्रदूषण दूर भगाओ

सुनो बात सब करके ध्यान

वृक्षारोपण बस एक निदान

वन उपवन जब फिर महकेगा

जीवन कलियों सा चहकेगा।



बेटियाँ



जीवन आधार है बेटियाँ,

माँ बाप का प्यार है बेटियाँ,

केवल एक शख्शियत ही नहीं,

खुद एक संसार हैं बेटियाँ।



जीवन की छाँव धूप है बेटियाँ,

बहु बहन मां का रूप हैं बेटियाँ,

त्याग तप शर्म विनय की मूरत,

क्षमा दया का स्वरूप हैं बेटियाँ।



दुर्गा काली लक्ष्मी की मूरत हैं बेटियाँ,

धर्म कर्म कीर्तन की मुहुरत हैं बेटियाँ,

बेटी ना होगी जब फिर बेटे ना होंगे,

आज घर घर की ज़रूरत हैं बेटियाँ।



मां बाप के चेहरे की ओज हैं बेटियाँ,

मर कर भी जीती कहीं रोज़ हैं बेटियाँ,

कन्यादान है महादान हर दिल ये माने,

फिर किस बाप के लिये बोझ हैं बेटियाँ।

























बचपन



छोटे दिन औ लम्बी रातें,

कहाँ गईं सब मीठी बातें।

दादा दादी नाना नानी,

अब हैं बीती बात पुरानी।

खेल खिलौने हुए बेमानी,

अब कहाँ पीतल की निशानी।

खेल खेल में गिरना उठना,

ऊँचे ऊँचे टीले चढ़ना।

कहाँ मिट्टी के घर और जल,

अब हैं बस कंकड़ के जंगल।

बचपन की सब भूल कहानी,

आयी है मदभरी जवानी।

गुड्डे गुड़िया सारे खो गये,

तितली भौंरे जुदा हो गये।

बादल बिजली सावन भूले,

नही याद अब टूटे झूले।

दूर कहीं परियों क़ा डेरा,

तय करना है लम्बा फेरा।

दौलत सोहरत और कितने,

लालच में सब जन्में सपने।

अपनो से हमको दूर किये,

रिश्तों को चकनाचूर किये।

अब जो है अपनी जिंदगानी,

हँसते जख्मों की है निशानी।

झुरियाँ कह रही हैं कहानी

बड़ी बेबस ये जिंदगानी।















तितली रानी



तितली रानी तितली रानी

लगती हो तुम बड़ी सयानी

मेरे घर जब तुम आती हो

नाहक ही तुम शरमाती हो

नाजुक नाजुक तन तुम्हारा

लगता है ये कितना प्यारा

फ़ूल फ़ूल तुम मंडराती हो

जाने क्य़ा गीत सुनाती हो।

रंग बिरंगा भेष तुम्हारा

बोल कहाँ है देश तुम्हारा।

अजब गजब खेला करती हो

एक जगह न तुम थमती हो।

मन चाहे मैं तुमकों पकड़ूं

अपने आंगन तुझको रख लूँ।

पर मन की एक लाचारी है

स्वतन्त्रता सबको प्यारी है।



































तुम मन में वास करो



नभ में करलव करते पंक्षी

मन का सन्नाटा दूर करें,

दिल की जज्बाते स्वछंद

उड़ने को ये मजबूर करें।



ईंट पत्थर के महल सारे

अब हमें पुरातन लगते हैं,

झूठे हैं सब मान प्रतिष्ठा

मन को अपने ये चुभते हैं।



नहीं कहीं है ऐसा दूजा,

अपना प्रेम अपरिभाषित है,

केवल तन का ही मेल नहीं,

मिलन ये रूह आधारित है।



लाख भले ही आये विपदा,

पर मैं ना तेरा त्याग करूं,

मन हो जाता है ये बेकल

गर ना तुझको मैं याद करूं।



और सुनो मन की अभिलाषा,

प्रिये प्रेम का अहसास करो,

छोड़ो सभी महल चौबारे,

तुम मन में मेरे वास करो।



















मधुर मिलन



मन खंडित तन खंडित अरु खंडित अहसास हुये

मन की तृष्णा विचरत फिरे ये कैसे तुम पास हुये

हैं मेरे ये नयन नशीले कहते हो तुम इनको पैमाना

दिल में पलते जज्बातों का हाल मगर तुमने ना जाना

सागर नदियां झरनों का ये कल कल करता शोर है

सुनो पिया मधुर मिलन में यहीं तो दिल के चोर है

मेरे मन की तृष्णा है जो अब बस तुम पूरी कर दो

मेरे तपते अधरों पर तुम अधर जरा अपने धर दो

नहीं वासना तुम कहना मेरे दिल के अरमानों को

ये निर्मल गंगाजल से हैं शपथ मुझे भगवानों का

तेरे इश्क में साजन जलते अंगारों पर चल सकती हूँ

तेरे बाहों को समझ गगन मैं चंदा सी ढल सकती हूँ







औरत



नव जीवन प्रकाश दो

एक स्वछंद आकाश दो

पैरों की बेडी मै तोडु

झूठे ये आडम्बर छोडू

हम है रुप ममता का

जीवन की हर समता का

हमने जग को प्यार दिया

जीवन का अधिकार दिया

हमने दुख का पान किया

सुख सारा ही दान किया











मुझे रोशनी ये चुभती है



देखूं तो तो रग दुखती है,

मुझे रोशनी ये चुभती है।



अँधेरों से अपनी यारी

काफी कुछ है जिम्मेदारी

जज्बातों के सौदा होते

कुछ बचपन है नंगे रोते

देखकर अक्सर करुण दशा

सीने में आग सुलगती है

मुझे रोशनी ये चुभती है।



अब तो कोई प्रतिकार करो

कमजर्फो पर धिक्कार करो

बेबसों पे तंज़ कसते हैं

जो मन ही मन बस हँसते हैं



मन की पीड़ा बनके आँसू

आँखों में कहीं उतरती है

मुझे रोशनी ये चुभती है।



उजालों में बुरे काम हुये

अंधेरे बस बदनाम हुये

गैरों का हक जो खाते हैं

उजले कपड़े छिप जाते हैं

कुछ लालच की बातें बरबस

मानस को बेबस करती है

मुझे रोशनी ये चुभती है।



ऐसे भी हालत देखा है

शर्म झुके मस्तक देखा है

अस्मत की मारी फ़िरती है

कुछ यूं लाचारी फ़िरती है

छुप छुप कर सब कलियाँ ही जब

अपने बागों में खिलती है

मुझे रोशनी ये चुभती है।



राहें शैतानी पैठ हुई

हिंसक पशुओं की बैठ हुई

राहें नहीं अकेली चलती

बात बेटियों की हैं खलती

अपने उम्मीदों की लाली

जब सरे शाम ही ढलती है

मुझे रोशनी ये चुभती है।



क्यों सूरज लश्कर ले भागे

क्यों रातें तन्हा हैं जागे

कहीं चाँद नज़र नही आता

तारों का दल छुपता जाता

शाम उदासी में अक्सर जब

बिस्तर पर सोती जगती है

मुझे रोशनी ये चुभती है।



न्याय मंदिर विवश दिखता है

स्वार्थ में सच सिसकता है

सब सच का सौदा करते हैं

मुजरिम को माफी करते हैं

काले कोटों के नीचे जब

बैठे गरीबी सिसकती हैं

फिर मुझे रोशनी चुभती है।



















शहीद



करता हुँ नमन तुझे लेखनी,

तुने शहीदों के गीत लिखे,

है लिखा इश्क इस तिरंगे को

औऱ इस वतन को मीत लिखे।



लहू जिगर का गिरा जमीं पर,

फूट फूटकर माँ रोयी थी,

उठा साया मासूम सिर से,

एक सुहागन मांग धोई थी

मिटाकर खुद को ये दिवाने,

अजब सी अपनी जीत लिखे।

है लिखा इश्क इस तिरंगे को

औऱ इस वतन को मीत लिखे।





वादे तोड़े कसमें तोड़े

कितनी आँखें बेकरार है

पूछे मुझसे ये घर आँगन

लौटा नही मेरा यार है।

तेरी यादों की कहानी,

इस घर की हर एक ईंट लिखे।

है इस तिरंगे को इश्क लिखा

औऱ इस वतन को मीत लिखे।



है वही माहौल पहले सा,

मगर टूटा हुआ लगता है

इन हसते मुखड़ों के पीछे

अश्कों का छुपा लगता है

ना गाये कोई फाग औऱ,

न ही कोई नई रीत लिखे

इश्क लिखा है इस तिरंगे को

औऱ वतन को मीत लिखे।



नहीं सुनता है अब पुकारें

क्यों तू बूढ़े माँ बाप की

दे रहा है सजा तू इनको

आखिर ऐसे कौन पाप की,

अब कहना क्या हाल जिया का,

औऱ क्या हम तकलीफ लिखे,

इश्क लिखा है इस तिरंगे को,

औऱ इस वतन को मीत लिखे।



















खामोशी को बोल दो



चुप ना बैठो ऐसे अब

खामोशी को बोल दो

झकझोरो अंतर्मन को

अहसासों को बोल दो

अथाह पीर मन समेटे

फिर भी जीना पड़ता है

साँसों की रा हेतु

विष भी पीना पड़ता है

बड़ा ही निर्मम जान पड़े

कहते जिसे संसार है

कहाँ छुपा है अहसास वो

कहते जिसको प्यार है

खेल रही है खेल निराला

देखो मृत्यु इठलाती

पर क्या अकाल ही काल

कभी किसी को है खाती

देहिक सुख प्रधान हुआ

दैविक सुख है पुछे कौन

सब के सब ही दिखत मौन।

बस दो क्षण की सुख खातिर

नैतिकता का पतन करे

काम पिपासा पूर्ति खातिर

कैसे कैसे नित जतन करे।

वो भी तो तुझसा प्राणी

अँग जो तुने छिन्न किया

बता भला किस लालच वश

कारज तूने ये भिन्न किया











झूठा संसार



अभी अभी तो छूटा था मैं

रिश्तों के बँधन से

अभी अभी तो मुक्त हुआ था

दैहिक पीड़ा औऱ तन से

अभी तो सफर शुरू हुआ था

कि तुम क्रन्दन करने लगे

अभी तो क़दम उठा ही था

कि ये अश्क विचलित करने लगे

अब सोचूँ बरबस हूँ मैं

क्या मै तुझसा ही निष्ठुर हो चुका

सुख दुख के रँग सब रिश्तों के

क्या अपनो के अब धो चुका

सब कहते हैं मुझको पराया

पर क्या सच है तुम कहना

है कसम सांसों कि तुमको

अब ना तुम चुप रहना

गर मैं हुआ भी निष्ठुर

तुम बोलो कैसे कृत्य हुआ

मेरे मन के भाओ पर

बोलो किसका नग्न नृत्य हुआ

रिश्तों के पावन अहसास समेटे

मै हर दिन जीता आया था

सब रहे खुशहाल हमेशा

हंसकर विष पिता आया था

बातों के तीखे बाणों से

तन मेरा भी घायल होता था

कभी निपट अकेले में बैठ

ये मन मेरा भी रोता था

रिश्तों के अहसास सदा मै

उर अपने धारण करता था

तुम जियो हजारों साल

मै निषदिन मरता था।

पर तुमने मन के मेरे

भ्रम सारे दूर किये

मै बूढ़ा बेबस अज्ञानी हुँ

सोचने पर मजबूर किये

ज़रा जरा सी बात पर

कटु वचन कई सुनाये थे

बोलो क्या थी मेरी खता

जो तुम मुझको ठुकराये थे

अब जब की सांसो ने

तन का साथ छोड़ दिया

इस झूठी दुनिया से

सारे बँधन तोड़ लिया

तुम हो मेरे शुभचिंतक

कैसा ढोंग रचाते हो

तुमको कितना प्यार दिया

रो रोकर कथा सुनाते हो

वाह रे दुनिया तेरे दस्तूर

देखूँ कैसे निराले हैं

उजले उजले तन सबके

औऱ मन के सब काले हैं।

अच्छा है अब छोड़ जाना

इस झूठे संसार को।



























तितली



लिपट समीर की बाहों में कैसे इतराती है इठलाती है

चंचल अदा तेरी लहराती मेरे उर को भाती है

मधुबन मधुबन तू फ़िरती ज्यूँ कोई बंजारन

कितने भ्रमर रूठे बैठे बोल ज़रा किसके कारन।

कोमल नाजुक बदन तेरा फूलों से भी कोमल है

इंद्रधनुष का रंग समेटे फीका लगता संदल है



उस रब की तू सबसे प्यारी कृति लगती है

तेरा खिलता हुस्नोशबाब किसका उर न ठगती है

डाली डाली उड़ती फ़िरती ज्यू बाँटें कोई संदेश

कहाँ तेरा है घरौंदे रहती तू कौन से देश

इतना निर्मल इतना कोमल अंग अंग में प्यार भरा

मन को मेरे गुदगुदाती एक पावन अहसास तेरा।





माता-पिता



सबसे पहले प्रणाम चरणों में उनके

धरती पर साक्षात ब्रह्म जो कहात है

एक तो है रुप पिता का औऱ दूजा

परम ममता मयी मात जो कहात है।

एक ने पिलाया खून अपने कलेजे का

पालने में एक का कलेजा जल जात है

अपने हिस्से की रोटी खिलाकर हमें


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