Excerpt for भारत स्वाभिमान लौटाना है (काव्य संग्रह) by , available in its entirety at Smashwords



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वर्जिन साहित्यपीठ
78, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,
नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043

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प्रथम संस्करण - अप्रैल 2018
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भारत स्वाभिमान लौटाना है

(काव्य संग्रह)




कवि
प्रो. सतीश कुमार अग्रवाल









प्रो. कवि सतीश तुलसी

(प्रो. सतीश कुमार अग्रवाल)

7653875870, 9040720229,

skagarwal357@gmail.com





जन्म 24 जनवरी 1952 को मालेरकोटला, पंजाब, नानाजी के घर हुआ। दादा जी का घर जगराओं, पंजाब में था । क्लास सात तक की पढ़ाई पंजाब में हुई। 1965 में राऊरकेला आ गए और उसके बाद की पढ़ाई और काम सब यहीं हुआ। हायर सेकेंडरी (क्लास 12) तक इस्पात हायर सेकेंडरी स्कूल, सेक्टर-14, राऊरकेला से किया।

बी.टेक. और एम.टेक., आर..सी., राऊरकेला (एन.आई.टी.) से केमिकल इंजीन्यरिंग बिभाग से 1975 और 1983 में किया। पी.एच.डी., आई.आई.टी., बंबई से 1993 में किया। जून, 1982 से जून, 2017 तक एन.आई.टी, राऊरकेला में केमिकल इंजीन्यरिंग विभाग में प्रोफेसर के रूप में काम किया।



काव्य सफ़र – करीव सत्रह सालों का लंबा सफ़र है पर छपवाने का कुछ खास मौका नहीं मिला। एक पुस्तिका “चेष्टा” के नाम से आठ फरवरी 2011 को छपवाई थी। इसमें मेरी चुनी हुई 15 कविताएं थी। एन.आई.टी की स्टूडेंट्स की ऑनलाइन मैगज़ीन मंडे मॉर्निंग में कई बार मेरे विषय में और कविताओं के बारे में छपा। और भी इक्का-दुक्का कविताएं छपती रहीं।

मेरे देश भक्ति के गीत “भारत स्वाभिमान लौटना है” को भजन सम्राट अनूप जलोटा जी ने संगीत कंपोज किया और गाया है। इसका संगीत श्री दिनेश कुमार दुबे जी ने दिया था। इसका विडियो “bharat swabhiman lautana hai” के नाम से गूगल और यूटयूब पर देखा जा सकता है। विडियो में मैंने गायक के रूप में एक्टिंग भी की है।



अभी तक 100 से ज्यादा कविताएं लिखी गई है। उनमें से चुनी हुई 51 इस किताब में आपके लिए प्रस्तुत हैं। आपसे निवेदन है कि इन कविताओं के बारे में मुझे जरूर बताएं कि आपको कैसी लगी।







जय हिन्द, जय भारती-

चलो उट्ठो हे देश बासियो,

नया इतिहास रचाना है,

भारत को स्वच्छ बनाने का,

संकल्प आज दोहराना है.

जय हिन्द...........

इस संकल्प के साथ-साथ,

गँगा को निर्मल बनाना है,

अब समय नहीं कुछ है बाकी,

इन कामों में लग जाना है.

जय हिन्द...........

आने बाली पीढ़ी को,

कुछ तोहफा दे कर जाना है,

अब तक तो लिया सब हमने है,

अब कुछ तो देकर जाना है.

जय हिन्द...........

नौजवान, बच्चे, बुज़ुर्ग,

सबको इसमें लग जाना है,

फिर कोई भी बाधा आए,

मिल करके हमें मिटाना है.

जय हिन्द..........



चलो उट्ठो हे देश बसियो,

तिरंगे को ऊँचा उठाना है,

भारत को स्वच्छ बनाना है,

गँगा को निर्मल बनाना है.

जय हिन्द..........

चलो उट्ठो हे देश बासियो,

नया इतिहास रचाना है,

भारत को स्वच्छ बनाने का,

संकल्प आज दोहराना है.

जय हिन्द..........









हँसना

बहुत मुश्किल है हँसना और हँसते रहना,

उससे भी मुश्किल है, अपने आप पर हँस पाना,

और सबसे मुश्किल है,

अपनी ही मुसीबतों पे हँस पाना।

जो अपनी मुसीबतों पे हँस पाएगा,

वो ज़िन्दगी में कभी नहीं पछताएगा,

एसी घड़ीयों में हँस पाना ही,

आपको अपनी मज़िंल तक,सही सलामत पहुँचाएगा।

कुछ लोग सोचते हैं, कि हँसना ठीक बात नहीं है,

खासकर जब हँसी उन्मुक्त हो, ठहाके वाली हो,

वो ज़रा सहम से जाते हैं,

सोचते हैं कि कोई उन्हें, पागल तो नहीं समझेगा।

पर मौके जब भी आते हैं,

वो कब अपने आप को रोक पाते हैं,

खिलखिला के हँसते हैं, नई ताज़गी को महसूस करते हैं,

पर फिर भी, दुर्भाग्य देखिए, वो ठहाकों को सही नहीं मानते हैं।

यह सिर्फ उनके ऊपरी मन का डर है,

जो शायद सदियों से, पिड़ी-दर-पिड़ी, उन्हे विरासत में मिला है,

पर ऐसे डर, जो सही नहीं हैं,

समय के साथ, अपना असर खो देते हैं।

जब भी थोड़ी धुलाई-सफाई होती है,

डर पिछे रह जातें हैं,

और हँसी और ठहाकों से,

माहौल में फिर से जान आ जाती है।

पर सावधान, कभी भूलकर भी,

दूसरों पर मत हँसना,

और कभी हँसी निकल ही जाए,

तो हँसने के बाद, उससे माफी ज़रुर माँग लेना।

इससे एक ऐसा दोस्त तुम्हें ज़रुर मिलेगा,

जिसकी तलाश, तुम्हें बहुत पहले से थी,

खूब आगे बड़ो और हँसने की दुनिया में कामयाब रहो,

इन्हीं इच्छाओं और दुआओं के साथ, विदा लेता हूँ।



































भारत स्वाभिमान लौटाना है



उठ जाग मुसाफिर भोर भई,

अब कर्म-योग को जाना है,

फिर आगे बढ़ कर हम सबको,

भारत को आगे बढ़ाना है.

उठ जाग....

इस योग के द्वारा ही फिर अब,

भारत स्वाभिमान लौटाना है,

आओ हम सब फिर मिल जाएँ,

भारत को स्वर्ग बनाना है.

उठ जाग....



उठ जाग मुसाफिर भोर भई,

अब पुन्य कर्म को जाना है,

सोया है भारत देश अभी,

उसे अभी से आज जगाना है।

उठ जाग....

जब सौ करोड़ से ज्यादा हम,

राम, अल्लाह, नानक, ईसा यहाँ,

तब कौन हमें अब रोक सके,

भारत का मान बढ़ाना है।

उठ जाग....



उठ जाग मुसाफिर भोर भई,

अपने कामों पे जाना है,

फिर कोई भी मुश्किल आए,

हमको ही दूर भगाना है।

उठ जाग....

हममें ही कोई गांधी है,

हममें ही झांसी रानी है,

हममें ही सुभाष बोस भी हैं,

हममें ही भगत सिहं भी हैं.

उठ जाग....



उठ जाग मुसाफिर भोर भई,

अब कर्म योग को जाना है,

भारत स्वाभिमान लौटाना है,

भारत को स्वर्ग बनाना है।

उठ जाग....

सोया है भारत देश अभी,

उसे अभी से आज जगाना है,

अब यह ही बचन निभाना है,

अब आगे बढ़ते जाना है।

उठ जाग....



उठ जाग मुसाफिर भोर भई,

अब कर्म योग को जाना है,

फिर आगे बढ़ कर हम सबको,

भारत को आगे बढ़ाना है।

उठ जाग....

जो भी करो अच्छा ही करो,

अब यह ही बचन निभाना है,

जो बीत गया सो पीछे है,

अब आगे बढ़ते जाना है।

उठ जाग....



उठ जाग मुसाफिर भोर भई,

अब कर्म योग को जाना है,

फिर आगे बढ़ कर हम सबको,

भारत को आगे बढ़ाना है।

उठ जाग....उठ जाग......उठ जाग।



























हमारी धरती माँ

यह वो धरती है,

जहाँ डाकू भी महाॠषि बन जाते थे,

हम तो फिर इन्सान हैं,

यहाँ शैतान भी भगवान बन जाते थे।

वही दस्तूर आज भी यहाँ कायम है,

पर आज शैतान भगवान बनता तो है,

पर असल में,

वो और भी बड़ा हैवान बन जाता है।

ज़रा सोचिए ऐसे हैवान के लिए,

कहाँ से हम एक शिव लाएँ,

जो भस्मासुर को पैदा भी करे,

और उसे भस्म भी कर सके।

तुम अगर चाहो, तो तुममें से हर एक,

एक-एक शिव हो सकता हो,

क्योंकि इन आज के भस्मासुरों को,

पैदा करने का श्रेय तुम्हारा ही तो है।

और तुममें वो शिव-शक्ति है,

ज़रा उसे पहचानो और फिर देखो,

यह धरती माँ, कैसे फिर से,

शैतानों को असली देवता बनाती है।





























ईद, होली, दिवाली और क्रिस्मस



ईद बहुत-2 मुवारक हो हम सबको,

यही इच्छा उस पर्वरदिगार की है,

वही अल्ला है, राम है, रहीम भी है,

वही हम सबके करीब भी है।

हम सब इस माटी की देन हैं,

इसलिए इक दूसरे के करीब हैं,

यह झगड़े जो हैं सब ऊपरी हैं,

भीतर से हम सब एक हैं-2

जितनी जल्दी इस सच को हम मान जायेंगे,

उतनी ही जल्दी एक दूसरे को पहचान जायेंगे,

मिलना तो तय है, बस कुछ समय की बात है,

उसके गुजर जाने के बाद हम एक हैं, एक हैं।

कोई अपने आप से कभी ज़ुदा हुआ है क्या,

तो फिर हम आज ज़ुदा ज़ुदा से क्यों हैं,

अरे आओ खुशी से आज ईद मनायें,

खूब प्यार से मिल कर आज सैवईयाँ खायें।

बहुत हुआ हमने अलग अलग ईद मनाई,

अलग-2 ही रहकर होली और दिवाली मनायी,

कभी गुरुपरव है, क्रिसमस भी अब आने को है,

चलो आज यह तय करें, छोटी-2 सी कसमें खायें।

कि आज से, बल कि अभी से,

इक दूसरे के दिल से जुड़ जाएं,

फिर देखें, यह लड़ाने बाले,

कैसे हमसे आके मिलते हैं-2

आखिर वो भी तो इन्सान हैं हमारे जैसे,

बस कुछ समय का फेर था जो बिछुड़े थे,

अब आ गये जो हम हैं सबको मिलाने बाले,

बस अब सब ठीक-ठाक होगा, यह तय है।

चलो अब मिलने-मिलाने कि तैयारी करलें,

प्यार के रंगो की, मह्फिल को सजाने की,

गुफ्तगु और इश्क की तैयारी करलें,

ऐसा हो कि जन्नत को यहां ले आएं।

ताकि जन्नत में जाने की चाहत ही न रहे बाकी,

तब भी जाना भी पड़े, कोई फर्क नहीं हमको पड़ेगा,

आखिर जन्नत से जन्नत को जाने का सबब क्या है,

सब एक है, सब जगह, कोइ फर्क नहीं है।

बस अब तो मुझे थोड़ा जाने दीजीए,

जल्द आ के मिलूँगा, यह वादा है,

खुदा हाफ़िज, राम-2, ससरियाकाल,

नमस्कार, सबको प्रणाम, शुक्रिया।



















पत्नी और प्रेयसी



पत्नी और प्रेयसी, एक ऐसी दो तलवारें हैं,

जो कभी एक म्यान में, एक साथ नहीं रह सकती,

पत्नी को प्रेयसी बनाएँगे, तो वो पत्नी नहीं रह पाएगी,

या फिर प्रेयसी भी, कभी अच्छी पत्नी नहीं बन पाएगी।

मेरे कहने का यह मतलब कभी न निकालना,

न ही उसको पत्नी स्वीकार करने में हिचकना,

पर असली मंज़र और फैसला लेने से पहले,

कम से कम अपने को खूब ठोक-बजा के परखना।

पत्नी माँ है, बेटी है, बहू है और समाज़ की एक इकाई भी है,

जबकी प्रेयसी सिर्फ प्रेयसी है,

अगर उसे पत्नी बनाना चाहते हो, तो यह भी सोच लेना होगा,

और अपनी ओर से, पूरा सहयोग भी देना होगा।

तभी वो एक सफ़ल पत्नी और एक सफ़ल प्रेमिका बन पाएगी,

और हम सबके जीवन को, स्वर्ग बना पाएगी,

हर एक लड़की जब ससुराल जाती है,

यही शिक्षा हमेशा से दी जाती है।

कि सफ़ल पत्नी के साथ, प्रेयसी बनके रहना भी ज़रुरी है,

बर्ना ज़िन्दगी इसके बिना, नितांत अकेली और अधूरी है,

बस उसे थोड़ा सा सहारा चाहिए होता है,

जो उसको, तुमको ही देना होता है-2

























इन्सान का दिल



वैसे तो हर जिंदा चीज का दिल धड़कता है,

पर इन्सान के दिल को धड़कने के लिए,

उसमें जिंदापन, उमंग और कुछ तरंगों का होना भी,

उतना ही ज़रुरी है, जितना कि कांटों में चुभन।

यह चुभन ही इन्सान को इन्सान होने का अहसास दिलाती है,

एक दूसरे पर मर मिटने को उकसाती है,

किसी और के लिए, सब कुछ कर गुजरने को,

आपको और हम सबको, तैयार कराती है।

किसी दूसरे को, अपने से भी उपर समझना,

समाज, देश और दुनिया को अपना समझना,

इन्सान को इन्सान बनाता है,

दिल के सही जगह होने का अहसास दिलाता है।

वर्ना इन्सान भी, सिर्फ जिन्दों की ज़मात में तो आ जाएगा,

पर इन्सान कहलाने से दूर ही रह जाएगा,

मैं यह हर्गिज नहीं कहूँगा, कि फंला-2 को तुम प्यार करो,

पर कम-से-कम, एक किसी और से तुम प्यार जरुर करो।

क्योंकि प्यार कि फ़सल, बिना बीज के ही पनपती है,

खूब लहलहाती है, और अगली बार के लिए,

खुद ही अपने निशान छोड़ जाती है,

अच्छा तो अब चलता हूँ,

किसी और पड़ाव पर फिर मिलने के लिए।























ज़र्रा (मिट्टी का कण)



मैं तो सिर्फ़ एक ज़र्रा हूँ,

पाँव के नीचे रौंदे जाने के लिए,

पर अगर वो पाँव आपके होते,

तो मेरा रौंदा जाना भी सफ़ल हो जाता।

इसी सफलता की उम्मीद लिए,

मैं कितनी सदियों से पड़ा हूँ यहाँ,

देखिए कब वो इस रास्ते पे आतें हैं,

मुझे देखते भी हैं, या रौंदे बिना, यूहीं निकल जाते हैं।

वैसे फैसला आने से पहले, नाउम्मीद होना,

यह मेरी फ़ितरत (आदत) नहीं है,

वर्ना यूहीं सदियों से पड़े रहना,

कोई आसान काम नहीं है।







ठहाके

मैं तुझे ठहाके लगाना सिखाना चाहता हूँ,

ताकि तुम जिन्दगी की हर मुसिबत में भी,

ठहाके लगा सको।

यह जिन्दगी और कुछ नहीं, एक गुब्बारा है,

और इसे हमें आकाश में उड़ाना है।

इसलिए ठहाके लगाना सिखना ज़रुरी है,

मैं तुझे ठहाके लगाना सिखाना चाहता हूँ-2

















शिव



शिव का प्याला कोई मुझे बताए क्या,

मेरे घर में खुद शिव है, कोई मुझे बताए क्या।

भोले जैसा मेरा शिव भी, तांड्व करता वो भी है,

मेरे घर की सारी हाला, पीता है वो मेरा शिव।

शिव का प्याला कोई मुझे बताए क्या,

मेरे घर में खुद शिव है, कोई मुझे बताए क्या।



















फूल

फूल तो फूल हैं, एक दिन में मुरझा जाते हैं,

एक ही दिन में, हम सबको खुशी दे जाते हैं।

मुस्काते हैं

खुशीयाँ बरसाते हैं,

क्या इतनी लम्बी उमर पाकर भी,

हम यह कर पाते हैं?

हाँ कर सकते हैं, अगर हम ठान लेंगे,

कि आज से, बल्कि अभी से ही,

हम अपनी खुशी से पहले, दूसरों की खुशी माँग लेंगे।

किससे माँग लेंगे – अपने आप से, और क्या,

अगर हम किसी को खुशी देना चाह्ते हैं,

तो अड़चन कहाँ है, मौज से दीजिए।

और खुशी दे देने के बाद,

जो खुशी हमें मिलेगी, वो अनमोल होगी,

इसलिए खुद खुशी पाने के लिए,

खुशियां बाँटना जरुरी है।





































एक नन्हा सा कलाकार



कलाकार का जब भी जन्म होता है,

दो साल, दस साल या कि पचास साल की उमर में,

वो पहले एक नन्हा सा कलाकार ही होता है,

उसे वैसे ही दुलारना और प्यार से पालना होता है,

यह काम हम सबको और समाज़ को ही करना होता है।

जब कोई नन्हा सा कलाकार,

पहली बार स्टेज पे जाता है,

मन में बड़ी उमंगे, ऊपर उठ पाने की चाह लिए जाता है,

साथ में थोड़ा डर भी सताता है।

स्टेज पर जाते ही, तेज रोशनी में,

जब तालियों की गड़गड़ाहट उसका स्वागत करती है,

हाँलाकि यह स्वागत है,

वो कुछ और घबड़ा जाता है।

अपने आप को फिर से समेटता है,

कुछ कह पाने की, कर पाने की कोशिश करता है,

पर गले में, फिर कुछ अटक सा जाता है,

और वो फिर से चूक सा जाता है।

यही वो समय की घड़ी है,

जो अचानक रुक सी जाती है,

अगर ऐसे समय में, वो आपका साथ पाता है,

तो दर--दर आगे ही बढ़ता जाता है।

तो दोस्तों, इस समय की घड़ी को,

कभी यूहीं न गवाँ बैठिएगा,

वर्ना एक कली, फूल तो शायद न बन पाए,

पर आप भी, खाली हाथ रह जाइएगा।

एक नन्हे से कलाकार के लिए,

कलाकारी सीखना तो जरुरी है ही,

पर शायद, उससे भी ज्यादा,

उसे आपका स्नेह, प्यार और सहारा चाहिए।

फिर देखिए वो कैसे दिन--दिन,

नई-नई उच्चाइयों को छूता है,

आपको, हमको और सारे समाज़ को,

अपनी नई-नई कलाओं से सराबोर करता है।

अच्छा, अब बहुत हुआ, कहीं आप यह न समझ लें,

कि सर, बिना ब्रेक दिए, डबल क्लास ले लें,

खूब बढ़ो और दूसरों को भी बढ़ाबा दो,

इन्ही इच्छाओं के साथ, विदा लेतां हूँ .



























दुआऐं



कौन कहता है दुआओं में असर नहीं होता?

होता है-2, ज़रा किसी से दुआऐं लेकर तो देख,

या फिर किसी को दुआऐं देकर तो देख।

यह दुआऐं ही हैं जो तुम आज जिन्दा हो,

नहीं तो पैदा होने से पहले ही,

कोई कुँवारी माँ, इस समाज के डर से,

तुम्हे कब से गंगा में बहा चुकी होती।

या फिर इस देश का कानून ही,

जहाँ एवोर्शन करवाना एक प्रथा सी बन गई है,

तुम्हे इस दुनिया में आने से पहले ही,

पता नहीं कहाँ का कहाँ पहुँचा देता।

इसलिए दुआओं को कभी कम मत आँकना,

हालाँकि ये आज के साइन्सदान इसे बकवास ही,

कहते हैं और समझते भी हैं,

पर किसी के कहने भर से,

क्या कैलाश पर्वत झुक सकता है?





































कर्ज़ ने फिर ली किसान की जान



साल का आखिरी दिन, इक्त्तीस दिसम्बर, 2010,

दैनिक भास्कर की मुख्य खबर,

कर्ज़ ने ली फिर किसान की जान”,

कब तक इस देश का नेता गरीब का खून चूसता रहेगा,

कब तक इस देश की जनता यूहीं बैठे देखती रहेगी।

बस अब और नहीं और नहीं, चलो उट्ठो,

इन भेड़ियों को खदेड़ो, मारो या जला डालो,

बस अब सहने का अन्त आ गया है,

घड़ा जो गन्दे कर्मो का भरना था, भर गया है।

ऐ देश के नेता अभी भी वक्त है, संभल जा,

नहीं तो संभलने का समय भी नहीं मिलेगा,

तू न मर सकेगा, न ही जी सकेगा,

अपनी ही नज़रों में इस कदर गिर जाएगा।

तुम्हे बचाने वाला भी कोई नज़र नहीं आएगा,

जो आने की कोशिश भी करेगा,

तुमसे पहले ही अपने आपको मरा पाएगा,

सोचने का समय भी अब नहीं है, बस संभल जा।

ऐ इन्सान तू मरता क्यों है, मरना तो उनको चाहिए,

जो तेरी इस हालत के जिम्मेदार हैं,

तू चिन्ता मत कर, बस अब तू मेरे साथ खड़ा हो जा,

और इन सारी बुराईयों को खत्म करने में मेरी मदद कर।

अब यह तय है, दुनिया इधर की उधर हो जाए,


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(Pages 1-32 show above.)