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प्रथम संस्करण - अप्रैल 2018
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बांधो नहीं मुझे
(काव्य संग्रह)






कवयित्री
साधना मिश्रा







साधना मिश्रा

साहित्यिक उपनाम: समिश्रा

anshaddu251@gmail.com

छोटी-छोटी बातें कहने का शौक है मुझे। ‘समिश्रा’ के नाम से गद्य-पद्य, दोनों विधा में लिखती हूँ।



आत्म मुग्धता? नहीं

आत्म प्रवंचना? नहीं

फिर क्या बात है मुझमें

बस एक प्यारा सा दिल मेरा

और हंसी की सौगात है मुझमें

दुनिया में होंगे सुखनवर

बहुत अच्छे से भी अच्छे,

पर बात जो मेरी

वह किसी में भी नहीं































जल ही जीवन है



जल ही जीवन है

हम नारा बहुत लगायेंगे

जल को संचित करना

ध्येय नहीं हमारा है

पनघट सूखे,नदियाँ सूखीं

नहीं बावड़ी कुआं है

नलों से पानी भरपूर मिले

मांगे हक, अधिकार है

बोरवेल से पानी खीचें

हम धरती के गर्भ से

धरती की क्षमता से ज्यादा पानी

रोज हम दुहते हैं

पर धरती को पानी मिलें

उद्यम नहीं करते हैं

जंगल जंगल काट कर

बस्ती हम बसाते हैं

जो पानी सोखे पेड़

एक नहीं लगाते हैं

बिना पेड़ के बादल भी

रूठे रूठे आते हैं

बिना बरसे सूखे सूखे

लौट ही जाते हैं

सूखी धरती, सूखे कंठ

प्राणी मांगे पानी पानी

गलतियों का अपनी

भुगतान करता है प्राणी

बूँद बूँद जल बचाना

अब हमारा अभियान हो

धरती सोखे बारिश का पानी

सार्थक पहल हो

पेड़ एक ना कटने पाए

जंगल हम बचायेंगे

धरती को वचन दे हर प्राणी

पांच पेड़ लगायेंगे

बारिश के हर बूँद की

हिफाजत हम करेंगे

तालाबों में, कुओं में

बावड़ियों में भर लेंगे

धरती से जितना लेंगे

धरती को उससे ज्यादा देंगे

जो यह ना कर पाया प्राणी

भुगतान को तैयार रहे

बनेगी एक ऐसी दुनिया

जहाँ महंगा पानी होगा

सस्ता होगा खून

प्रभुत्व नहीं, पानी पर युद्ध होगा

जल को संरक्षित रखना

समस्त विश्व का लक्ष्य हो

जल का हर बूँद है जीवन

याद हमें रखना होग











सूरत और सीरत



सूरत नहीं होती हैं

किसी सीरत का आईना

फितरतें बताती हैं

दिल का हाल क्या है

सफर है जिंदगी का

चेहरे मिलते है बेशुमार

फितरतें बता देतीं हैं

जमाने का हाल

मत बसाओ उन्हें

अपनी आंखों मे

जो लिखे नहीं

हाथों की लकीरों में

मत मांगिए

उन्हें तकदीरों से,

मिलेंगे नहीं

वो खैरातों मे



आरक्षण का अधिकार



खैरात पर जिनके पलते हैं

आंख उन्हें ही दिखाते हैं

मुफ्त सब उन्हें चाहिए

टैक्स हम पटाते हैं

झूठे केस लगाने का

हक चाहिए, हकूक चाहिए

अपील भी उनकी ना सुनी जाएँ

क्यों इन्हें एतराज चाहिए

झूठी अर्जी की खुले ना पोल

ऐसा कानून चाहिए

अयोग्य का ही राज चले

ऐसा उन्माद चाहिए

जो इनको मिलती खैरात

इनके नेता ही खा जाते हैं

अरबों खरबों की जमा कर दौलत

राजभवन सजाते हैं

वोट बैंक बना कर इनको

राज वो करते जाते हैं

सत्ता की हवस में

अराजकता का वरदान दिया

यह आवाज का मंच नहीं,

शक्ति प्रदर्शन की आजमाइश थी

बारह लोगों की बलि ले ली

हिंसक कार्यवाही थी

ये भी लगे हुए हैं दांव पर

नेताओं की चांदी है

जाति में बंट जब सब

वोट बैंक बन जाएंगे

लड़ मरेंगे आपस में सब

दुश्मन बैठ मुस्कुरायेंगे













क्या कहिए



वफाओं के तराने

यूं ही नहीं गाए जाते

सिलसिला मोहब्बतों का

खत्म होता नहीं

आरजुओ का दामन

भरता नहीं कभी

दीवानगी का आलम

क्या कहिए

आग के दरिया में डूबे को

चिंगारी का क्या खौफ होगा.

आंसुओं के समन्दर मे डूबे को

शबनम का क्या शौक होगा











बांधो नहीं मुझे

बांधो नहीं मुझे छंद

दोहा कवित् में

मुझे मेरे दिल की कहने दो

सुनो तुम भी

बात मेरे दिल की

दिल से दिल को

जुड़ने दो

क्यों मुझे बांध रहे

बंदिशों में

बात मेरे दिल की

तुम सुन लो

रहेगा गुलाब तो

गुलाब ही

नाम चाहे कुछ

भी रख लो

सुगंध तो बिखर

कर ही रहेगी

चाहे सौ तालों में जड़ दो





































रो रही है अवनि



मधुर मधुर चांदनी

छायी चहुं ओर है

रात रानी की सुवास

महकी किस ओर है

निःशब्द है पवन भी

पात भी स्तब्ध है

रो रहा है कौन यहाँ

किसका क्रंदन है

क्या किसी ने किया

किसी दिल पर घात है

रो रही है धरती और

उदास आकाश है

सुगम्यता है खो गई

उजाड़ है बियाबान है

मनुष्य है बढ़ रहे

मानवता का हास है

चहुं ओर जहां देखो

बस घात है घात है

मतलबी सारा जहाँ

बस स्वार्थ है स्वार्थ है

अधर्म का बोलबाला, धर्म का नाश है

रो रही है अवनि यहाँ

क्या यही विकास है



























नाली के बजबजाते कीड़े



आठ महीने, आठ साल

या अस्सी साल का स्त्री रूप?

हवस के भूखे भेड़ियों के लिए

कोई फर्क नहीं?

ये नरपिशाच हैं

इंसान नहीं ?

हर कौम, हर समाज में हैं छिपे हुए?

इन्हें सिर्फ मौत की सजा दो?

मजहबी रंगों में मत रंग दो?

औरत की बद्दुआ

नष्ट कर देगी उस कौम को?

जहाँ ये रंगे सियार हैं बैठे हुए ?

इन नाली के कीड़ों को?

किन्नर बना दो?

ये हर मां,बेटी,बहन के

हैं अपराधी?

इन्हें धरती पर रहने की जगह मत दो?

औरत के इज्जत को तार तार करने वालों?

भगवान को भी नया नरक बनाना होगा?

तुम्हारे जघन्य पापों का दंड देने के लिए?

ऐ नाली के बजबजाते कीड़ों ?

तुम्हें कहीं ठौर ना मिले?


























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