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Excerpt for Pakiza by , available in its entirety at Smashwords

पाकीज़ा









आक़िल अहमद सैफ़ी





THE AAKIL’S PUBLISHERS

(The Way Of Famous)

PUBLISHED BY

THE AAKIL’S PUBLISHERS (INDIA) 2018

NEW DELHI

DR.AS.AAKIL@GMAIL.COM

Copyright ©AAKIL AHMED SAIFI, 2018

THIS book is a work of fiction. Names of persons, organization, businesses, characters, incidents, places and events are fictional and a product of the imagination of the author. Any resemblance to actual events or places or persons, living or dead, is entirely coincidental. Any reference to hotels, places, businesses, locations and organizations and businesses, while real are used in a way that is purely fictional and have no resemblance to any existing organization, location etc., and any use thereof is not intended to harm, disrespect, defame or derogate any third party.



ISBN –

Price: FREE

All rights reserved ®

First Imression 2018



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The opinions/ contents expressed in this book are solely of the author and do not represent the opinions/ standings/ thoughts of the Aakil’s Publishers.



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लेखक के बारे में


किल अहमद सैफी का जन्म 06/09/1999 को दिल्ली में हुआ | पिता का दिल्ली में छोटा सा कारोबार है और माता जी गृहणी हैं |


लेखक ने 10 वीं कक्षा सीबीएसई बोर्ड दिल्ली से की है और अब पत्राचार विद्यालय (ओपन लर्निंग) दिल्ली से 12 वीं कक्षा कर रहे हैं इसके अलावा लेखक जामिया मिलिया इस्लामिया (ओपन लर्निंग) दिल्ली से उर्दू में डिप्लोमा कर रहे हैं और राष्ट्रीय उर्दू भाषा विकास परिषद दिल्ली से उर्दू में एक ओर डिप्लोमा कर रहे हैं |

लेखक का जन्म एक मध्यम मुस्लिम परिवार में हुआ | 17 साल की उम्र में अपनी पहली रचना ‘प्यार का जन्म’ लिखी | और अब दूसरी रचना “पाकीज़ा’’ लिखी |

लेखक से संपर्क आप उनको ईमेल -Dr.As.Aakil@gmail.com भेज सकते हैं आप http://www.twetter.com/AakilAhmedsaifi पर tweet भी कर सकते है या आप इन्हें http://www.facebook.com/officialAakilAhmedsaifi या instagram http://www.instagram.com/officialAakilAhmedsaifi पर भी follow कर सकते हैं |



संपर्क करे फ्री (FREE) मुशायरे, Program या Event के लिए |

Dr.as.aakil@gmail.com



किताब के बारे में



क जो लिखी गई है ताजोर्बो के बाद |

इस किताब में मेरी जिंदगी के अहसास, तजुर्बे और हकीक़त को कोरे कागज पर उतारा है | इसमें जिंदगी की हकीक़त, माँ – बाप का प्यार, सियासत और इश्क को बेशुमार है | मुझे चर्बी लिखने की आदत नहीं, मैं अदब लिखता हूँ | मेरी किताबों को हर कोई पढ़ सकता है |

वैसे मैं इतना लिखता नहीं हूँ | मैं अपनी बात बहुत ही कम अलफ़ाजो में कह देता हूँ | मैं कभी – कभी ही लिखता हूँ और बहुत कम लिखता हूँ | आप मेरी शायरी को अपनी जिंदगी से, आपने माँ-बाप से, अपने बहिन-भाई से, अपने इश्क़ से या सियासत से और अपने किसी एहसास में उतर सकते है |

ऐसा बिलकुल नहीं है की मैं अपने इश्क के लिये लिखता हूँ | मैं अपने हर एहसास को अपने इश्क से नवाज़ देता हूँ ताकि आप इसे मेरे अहसास न समझे | मैं चाहता हूँ की आप मेरे अहसासों को अपने अहसास अपनी जिंदगी में उतारे | कोई भी मेरी अलफ़ाजो का ग़लत मतलब ना निकाले | जो मैं बयां करना चाहता हूँ उसे महसूस करे |

स्वागत है आपका पाकीज़ा में |

















विषय-क्रम

  1. शायद

  2. ये ना समझों

  3. अदब की महफ़िल

  4. मशहूर

  5. बलात्कार

  6. कोई अज़ान को बदनाम

  7. पाकीज़ा

  8. डर

  9. सौ रूपए में भगवान

  10. ऊँचे ख़्वाब

  11. बिना दिल के

  12. याकूब

  13. वो चोरों से ईमान मांगता है

  14. गौ मूत्र

  15. उसे ये लगता है

  16. ख़ुदा थोड़ी है

  17. वक़्त पर मोहब्बत

  18. ऐसी कौन-सी चीज़ हैं जो ख़राब नहीं होती

  19. इज्ज़त

  20. जिंदगी की तलाश

  21. खुशियों का कारोबार

  22. भूल

  23. वो कहते है

  24. अहमियत

  25. पियास

  26. बदनसीब

  27. हसरते थी बहुत

  28. मुझे मालूम है

  29. मुझे बेकार ना समझों

  30. बदला

  31. रौशनी

  32. बिन माँ-बाप का घर

  33. पतंग

  34. तेरी मोहब्बत के गवाह



शायद



लोग अब मुझे दुआएँ भी काम देने लगे है,

शायद इसलिए अब मैं बीमार रहने लगा हूँ |



अब ज़्यादा वक़्त नहीं है मेरे पास,

सांसे भी बची-कुची रह गई है ||



शायद इसलिए अब मैं उदास रहने लगा हूँ,

ना जाने ऐसे कौन से गुनाह कर दिए मैने |



जो अब तनहा वक़्त बिताने लगा हूँ,

देने को ज्यादा कुछ नहीं है अब मेरे पास ||



अब तो लोग दुआएँ भी लेने आते नहीं है मेरे पास,

मरने पर मेरे आयेंगे सब लोग |

शायद ज़िन्दा हूँ तो मिलने आते भी नहीं है ||





















ये ना समझों



ये ना समझों मुझे उससे मोहब्बत नहीं,

या मेरी उससे कोई दुश्मनी हैं |



बात तो सिर्फ झूट बोलने की हैं,

वरना क्या हमने अपने दुश्मन को खंज़र नहीं दिया ||



उसने पानी के बदले ज़हर दिया मुझको,

अरे उसने सच बोला तो ज़हर पिया हमने |



तुम तो अपने थे तुमसे तो वफ़ा मांगी,

और तुमने उसके खातिर, जो दुश्मन था दगा दिया ||



तुमने कहा तो होता सिर्फ एक बार,

तुम्हे हमारी जान लेनी थी |



हम तो ख़ुशी से मर जाते,

तुम्हे अपनी जान दे कर ||











अदब की महफ़िल



सुना हैं अदब की महफ़िल में चर्बी साथ आई,

परयों के साथ डायन साथ आई |



हवा के साथ रवानी साथ आई,

रोशनी के साथ फ़ितरत साथ आई ||



ज़ज्बात के साथ यादें साथ आई,

हुस्न के साथ ज़वानी साथ आई |



बलाओं के साथ रूहानी साथ आई,

जिंदगी के साथ कहानी साथ आई ||



हम तो उसकी महफ़िल में अकेले बैठे थे,

धुप ने छाओं को भगा दिया अपने खातिर,

सूरज ने चाँद – तारों को छुपा दिया अपने खातिर |



झूट ने सच को दबा दिया अपने खातिर,

वो तो सच बताने गया था,

झूट ने मार के भगा दिया डर के खातिर ||



माँ ने बेटी को छुपा दिया इज्ज़त के खातिर,

आज फिर एक किसान मारा गया देश के खातिर |||

मशहूर

बाज़ार में चर्चे है बहुत,

उससे कह दो मैं बिका नहीं हूँ |



ये तो साज़िश है ज़माने की मुझे बदनाम करने की,

उससे कह दो मैं मशहूर हुआ नहीं हूँ ||



ये जो खेलती है मेरे साथ खिलोने की तरह,

उससे कह दो मैं कोई खिलौना नहीं हूँ |



मैं दिखावा करता हूँ अपने दुश्मनो को ज़लाने के लिए,

उससे कह दो मुझे दुश्मनी नहीं है ||

बलात्कार



ज शहर में है जिस बलात्कार की ख़बर,

कल जोश में था आज कर गया होगा |



जिस्म से आई है फिर चीखने की सदा,

कल नशे में था सो कुछ कर गया होगा ||



कपड़े फाड़ कर, जिस्म चीर कर रूह निकल कर ले गया,

खिलौना है लगता है उसका दिल भर गया होगा|



कल खून से लत-पथ थे अख़बार शहर के,

आज एक छप गया होगा ||



सुना है कल पेशी है कोर्ट में उसकी,

अंधा कानून है बा-इज्ज़त घर गया होगा |



कल उसे देख कर बे-कशी में था,

आज फिर कोई खुदा के घर गया होगा ||



दुनिया से आज फिर कोई कम हुआ है,

कल एक कम था आज एक और दहशत-गर्द बढ़ गया होगा |||













कोई अज़ान को बदनाम



कोई अज़ान को बदनाम करता है,

तो कोई अल्लाह को बदनाम करता है |



कोई इस्लाम को बदनाम करता है,

तो कोई मुसलमानों को बदनाम करता है ||



वो मज़हबे इस्लाम को बदनाम करते है,

आतंकवादी बता कर |



वो मुहम्मद को बदनाम करते है,

बलात्कारी बता कर ||



सुना है बाज़ार में एक नया,

मस्जिद--कुरान उतारा गया |



मुसलमानों को बदनाम करने के लिए ||























पाकीज़ा



मैं पाक होकर भी नापाक हो जाता हूँ,

उनकी सोच इतनी गन्दी है |



सोचता हूँ तो परेशान हो जाता हूँ,

देख कर उनकी दरिंदगी रूह काप उठती है मेरी ||



मन करता है सज़ा दूं उस वक़्त तक,

जब तक गुनाहगार ना मिट जाए |||





डर



डर लगता है अब तो लिखने में भी,

डर लगता है अब तो अल्फाज़--बयां करने में भी |



डर लगता है अब तो सोचने में जो हो रहा है,

डर लगता है अब तो देखने में भी ||



मुस्लमान हूँ साहब,

कही आतंकवादी क़रार ना कर दिया जाऊँ |



मुझमे ताक़त नहीं है इतनी,

के I’m Not A Tererist क्र नारे लगाऊं ||

ये कोई फिल्म नहीं है साहब,

के नारे लगाऊं और बा-इज्ज़त बरी कर दिया जाऊं |



मैं कम-से-कम इतना तो मुस्लमान हूँ ही,

के मारा जाऊं ||

















सौ रूपए में भगवान



देखा है मैंने भगवान् को बाज़ार में सौ रूपए में बिकते हुए,

और लोग बात करते हैं इंसान क्यों बिक जाता है |



देखा है मैंने मौसम को रंग बदलते,

और लोग बात करते हैं इंसा क्यों बदल जाता है ||



देखा है मैंने दरिया के पानी को बर्फ बनते,

और लोग बात करते हैं इंसा क्यों पत्थर बन जाता है |



फिज़ायें रुख बदलती हैं ज़रूरत के मुताबिक़,

इंसा रुख बदलता आदत के मुताबिक ||



खुदा रुखसत कर देता है,

नेकी के मुताबिक |



फ़रिश्ते दुआ करते है खुदा से,

नामज़े कितनी अदा की जिंदगी में ||













ऊँचे ख़्वाब



ख्व़ाब तो उसने बहुत ऊँचे दिखाए थे,

मगर उसने ये कहकर गिरा दिया कि ये तुम्हारे लायक नहीं |



मैंने तो खुशियाँ मांगी थीं उससे,

और उसने ग़म भी दे दिया ||



साथ चलने को कहा था ज़िन्दगी में,

और उसने अकेला चलना सिखा दिया |



मैंने तो उसकी ज़िन्दगी में आने की इजाज़त मांगी थी,

मगर उसने ख़्वाबों से भी रुखसत कर दिया ||



ख्व़ाब तो उसने बहुत ऊँचे दिखाए थे,

मगर उसने ये कहकर गिरा दिया कि ये तुम्हारे लायक नहीं ||



















बिना दिल के



क्या बताऊ मुझे किस क़द्र परेशां किया जाता है,

गलती ना हो मेरी तो भी मुझे बदनाम किया जाता है |



एक वो है जो बिना दिल के ज़ीने को कहती है,

और एक हम है जो फिर भी मान जाते है ||



वो सोचती है मैं उसके बिना मर जाऊँगा ,

और यहाँ लोग ज़हर पीकर नहीं मरते |



मेरा दम घुटता है इन बंदिशों में, और वो कहती है आक़िल तुझको तो जीना रास आ गया ||


सुना है खुदा दिल की सुन लेता है,

आज़माया है हमने भी बहुत खुदा को |



गया था मैं भी कभी ख्वाहिशे ले कर,

फ़क़ीर समझ कर देहलीज़ से ही लौटा दिया मुझे ||



हमने भी देर ना की सारी ख्वाहिशे मिटाने में,

दुनिया जो बसाई थी कभी आँखों में अपने मुताबिक़ |



ख़्वाब सब धुँआ की तरह उड़ा दिए आसमां में,

आँखों से बस पानी छलकता रह गया ||

याकूब



समानों से आई है फिर मौत की सदा,

फिर कोई गुज़र गया होगा |



आज चोबारे में है जिस शख्स के मरने की ख़बर,

कल गमीं में था गुज़ार गया होगा ||



गावं में 3-4 बाकि बचे थे पंछी,

कल रात एक और उड़ गया होगा |



सुना है हवा ने उसकी जान ले ली,

बादलों से आई है फिर फरिश्तों की सदा ||

कल गमीं में था ये देख कर फरिश्तों ने फिर जान फूंक दी होगी,

कल तक बला बेटी पर थी आज बाप पर छोड़ गई होगी |



सुना है हवाएँ खुबसूरत हुआ करती है,

अरे खुबसूरत ही तो जान लिया करती है ||



क्या मिला तुझे ये तो बता मुझे,

तेरा भी तो परिवार होगा ना |

तेरा भी तो घर होगा ना,

तेरी भी तो दुनिया होगी ना ||



तेरी भी तो बराबरी का होगा ना कोई,

तूने एक नहीं सौ जिंदगियां बर्बाद की है |

फिर कोई खुदा के घर गया होगा,

कौन मशरूफ है यहाँ तुझसे,

मुझे ये तो बता ओ-हवा ||



उसने पूछा था उससे,

बाप का क्या है वक़्त पुरा कर गया होगा |



फिर कोई घर खली कर गया होगा,

वो बेखुदी में बहक गया होगा ||



ख़्वाबो में आई है हकीक़त आक़िल उसकी,

सुना है बुरा वक़्त है उसका शुरू हो गया होगा |||





वो चोरों से ईमान मांगता है



वो चोरों से ईमान मांगता है,

गद्दारों से इकरार मांगता है |

बेजुबानो से जबान मांगता है,

बेजानो से जान मांगता है ||



जो दुश्मन है उसके,

दुश्मनो से दुआ मांगता है |

बालाओं से हवा मांगता है ||



अपने माँ-बाप को परेशां करके,

वो खुदा से ज़न्नत मांगता है |

वो जो रोज़ दगा देता है,

दगाबाजो से वफ़ा मांगता है ||

जो हर पल बदल देते है अपने इरादे,

वो उनसे कसम मांगता है |

जिसके सीने में दिल ही नहीं,

वो उससे मोहब्बत की हवा मांगता है ||

सुना है पत्थरों को ज़रूरत नहीं होती दवाओं की,

फिर भी वो दवा मांगता है |

दूसरों का सुख-चैन लेकर,

वो फिर भी खुदा से सुकून मांगता है ||



कितनी बार कहा है मैंने उसे,

फिर भी वो खुदा से बार-बार मांगता है ||

गौ मूत्र

कोई गौ मूत्र तो कोई गंगा जल भेजता है मुझे,

मुझे ज़रूरत नहीं है इनसब की, मैं मुस्लमान हूँ |



इन्सान अपनी सोच से पाक होता है |



अगर इन्सान इनसे पाक होता ना,

तो आज रावण भी राम होता ||











उसे ये लगता है



हर छोड़ दिया है मैने,

उसे ये लगता है |

मैं आज भी उसे ढूंढता हूँ उसी शहर में ||



वो अफवाहों पर जीती थी,

और हम हक़ीकत पर जीते थे |



अफ़सोस अफवाह पुरे शहर में फैल गई आक़िल,

और हकीक़त किसी एक कोने में दब गई ||



ज़ो कभी बदलने निकले थे मोहब्बत की फिज़ाओ को,

वो आज खुद बदल गए |



जिसने हमसफ़र बनने का वादा किया था कभी,

वो आज मुह फेर लेते है हमारी तस्वीर देख कर ||























ख़ुदा थोड़ी है

लोग ज़हर पी कर नहीं मरते,

और वो समझती है मैं उसके बगैर मर जाऊंगा |



उसके सीने में दिल ही नहीं ,

और वो दिल की बात करती है ||



मैं बेजुबानो से गुफ्तगू करता हूँ,

इसमें मेरा क्या कसूर |

अगर वो मुझे अपनी कहानी सुनते है ||

अब खुदा ने भी इज़ाज़त दे दी अकेला ना रहने की,

दुश्मन ने दुश्मन से दोस्ती कर ली नए दुश्मन के लिए |



मैं जिंदगी लौटाउंगा, जो गुज़ार गई बरसों पहले,

अरे उसने कह दिया, खुदा थोड़ी है ||



यहाँ तो भगवान झूट बोल जाते है,

और तुम इंसानों की बात करते हो |||

















वक़्त पर मोहब्बत



सुना है वो मोहब्बत बखूबी निभा रहे है,

हर रोज़ नई हसीनाओ से दिल लगा रहे है |



बेवफाई खुद करके,

बेवफा हमें बता रहे है ||



तेरी रूह को शुकून नहीं मिलेगा तब तक,

मेरी खुशबु तादार रहेगी तेरी सांसो में जब तक |



अरे मांगने पर तो वक़्त पर मौत नहीं मिलती,

और वो सोचती है उसे मोहब्बत वक़्त पर मिल जाएगी ||

ऐसी कौन-सी चीज़ हैं जो ख़राब नहीं होती



इंसान तू ये तो बता,

यहाँ ऐसी कौन-सी चीज़ हैं जो ख़राब नहीं होती |



यहाँ मशीन ख़राब होती हैं,

यहाँ प्रकर्ति ख़राब होती हैं ||



इंसान ख़राब होता हैं,

नियत ख़राब होती हैं |



हवा, पानी, ज़मी, असमा,

चाहत, जवानी, इश्क, मोहब्बत, प्यार,

जिंदगी, रिश्ते ख़राब होते हैं ||



यहाँ सब कुछ खराब होता है,

यहाँ तक की भगवान भी ख़राब होते हैं |||





















इज्ज़त



वो जो कल इज्ज़त से खेल गई किसी की,

वो जो कल कई जिंदगियां ले चुकी थी |



वो जो कल तक किसी की औलाद थी,

सुना है आज वो औलाद वाली हो गई ||



वो जो कल किसी की इज्ज़त उछाल गई थी,

जिसकी कल तक कोई इज्ज़त ना थी,

वो आज इज्ज़त वाली हो गई |



वो दो आँखों में शादी का सपना सजा कर,

उन दो आँखों में खून के आंसू रुला कर गई थी ||



वो आज शादी के खवाब देखती है अपनी औलाद के,

दुसरो की खुशियाँ, ख़्वाब बिखेर कर |||



















जिंदगी की तलाश



जिंदगी की दौड़ में दूर तक निकल गए,

मगर जिंदगी ना मिली |



तजुर्बे बहुत मिले,

मगर ख़ुशी ना मिली ||



किसी ने पुछा मुझसे आक़िल,

तुम उदास क्यों रहते हो |



जिंदगी तो बहुत मिली,

मगर जिंदगानी ना मिली ||



खुशियों का कारोबार



किसी ने कहा मुझसे कारोबार करो,

पूछा जब ज़माने से मैने |



दोस्तों ने कहा वकील का कारोबार करो,

किसी ने कहा डॉक्टरी का कारोबार करो ||



किसी ने कहा धर्म का कारोबार करो,

किसी ने कहा इंजीनियरिंग का कारोबार करो |



किसी ने कहा कार का कारोबार करो,

किसी ने कहा किताबो का कारोबार करो ||



मुझे मालूम है उसका दिल कितना रोया था ये कह कर,

सिर्फ एक वो ही थी सारे ज़माने में,

जिसने कहा खुशियों का कारोबार करो |



जानती हूँ मैं नुकसान तो होगा बहुत,

मगर दुआए भी मिलेंगी बहुत ||















भूल



सुना था मैने आज आक़िल,

तू भूलता नहीं कोई बात |



गर तू देख ले झलक, एक बार किसी की,

उसे उम्र भर भूलता नहीं है ||



क्या हुआ ऐसा तेरे साथ बता मुझे आक़िल,

की तू अपने आप को ही भूल बैठा है |



क्या बताऊ मैं तुझे, -खुदा-की-बंदगी,

मत पूछो ना-जाने कितनी जिंदगियां उजड़ी है ||

वो कहते है



वो कहते हैं शुक्र अदा करो उस रब का,

जो तुम्हारे पास है सबके पास नहीं |



जब खुशियाँ नापते हो न साहब,

तो गम भी नाप लिया करो ||



ये दावा है मेरा, मुझसे ज्यादा गम,

किसी के पास न होंगे ||







अहमियत



जो कभी स्कूल नहीं गया,

वो स्कूल की अहमियत क्या जाने |



जिसकी कभी औलाद ना हुई,

वो औलाद की अहमियत क्या जाने ||



जिसका कोई अपना नहीं,

वो अपनों की अहमियत क्या जाने |



जिसने कभी अपने माँ-बाप की कद्र नहीं की,

वो माँ-बाप की अहमियत क्या जाने ||

जिसने कभी रिश्ते ना निभाए,

वो रिश्तो की अहमियत क्या जाने |



जिसने कभी जिंदगी ना ज़ी, ज़ी भरकर,

वो जिंदगी की अहमियत क्या जाने ||

















पियास



ल की ही बात है,

मैं पीता रहा पानी दिन भर |



मगर प्यास ना मिटी,

जब तलक लबों से ना लगा सब्नम--पानी ||



वो कहती है दुर से ही पी लो, ये लबों की सब्नम,

उसे कौन समझाए ये ज़वानी की प्यास है |



ये जब तलक नहीं मिटती,

जब तलक लबों से ना लग जाये ||

बदनसीब



क्या बताऊं मैं उस शख्स के बारे में,

जिसे बचपन में ही घर से रुसवा कर दिया गया |



एक अनजान शहर में अनजान लोगो के बीच,

और उसे हुक्म दिया गया, तुझे लाना है बहुत लाना है ||



ना घर था उसके पास, ना खाने को खाना,

और ना ही वो लोग, जिन्हें वो पहचानता था |



उस लाचार, बदनासिब ने मेहनत की अपने बदनासिब के लिए,

और फिर अचानक उसकी मेहनत रंग लाई ||



अब उसके पास घर था, खाना था,

और वो लोग जो उसे जानते ही नहीं पहचानते भी थे ||

















हसरते थी बहुत



सरते थी बहुत बचपन में,

की बाहर का खाना खाऊ, बाहर का पानी पियू |



घर का खाना कभी रास ही नहीं आया मुझको,

बड़ी मुद्दते हो गई घर का खाना खाए हुए ||



अब तो प्यास भी नहीं मिटती है बाहर के पानी से,

दुनिया बड़ी खुबसूरत लगती थी बचपन में |

वक़्त गुज़रा, उम्र घटी तो दोज़ख लगी ये दुनिया ||



मुझे मालूम है



जानता हूँ मैं वो कितना रोया था बच्चों को डांट कर,

जब बस में नहीं है पढाई, तो छोड़ क्यों नहीं देते हो |



एक बेटा है एम.फिल कर के घर में खाली बैठा है,

उम्र का तो बहाना है ||



वो जो पहाड़ो से टक्कर लेता था कभी,

आज वो डरता है सड़क पर चलने में भी |



उसे हालातों ने नहीं, धोकों ने तोड़ दिया,

वो अनपढ़ है आज भी लेकिन,

उसके आगे बड़े-बड़े इंजिनियर भी नाकाम हुए है ||



बच्चे भी परेशान है उस बला से,

तलवार पर खड़े है वो,

एक तरफ कुआ तो, दूसरी तरफ खाई है उसके |



जिस तरफ जाएँगे मरेंगे ही,

और अगर खड़े रहे तो कटेंगे ही ||









मुझे बेकार ना समझों



मुझे बेकार ना समझों,

मैं शायर हूँ और लेखक भी |



बुरे वक़्त को बेचता हूँ मैं अपने,

कही लफ्जों में पिरो कर,

तो कही कोरे कागज़ पर उतार कर |



मुझे बेदर्द ना समझों,

मैं दर्द बेचता हूँ, देता किसी को नहीं ||







बदला



तरा मैं जब मैदान--जंग में,

फटे कुरते सी हालत थी मेरी |



वक़्त बदला, चाल बदली, ढाल बदली,

लिबश बदला, तरीका बदला ||


सलीका बदला, हालात बदले,

और फिर मैं बदला |



और फिर सारी दुनिया ही बदल गई ||





रौशनी



चाँद की रौशनी रमज़ान--माहे में क्या होती है,

ये रात के अँधेरे में सहरी--रमज़ा बनाने वाली से पूछो |



कभी रात में चलकर तो देखो रमज़ा के महीने में,

कभी आजमा के तो देखो रमज़ा--खुदा को ||











बिन माँ-बाप का घर



क्या लिखूं अब तो अस्कों से,

ज़यादा कोरा कागज़ नम है |

क्या बताऊं तुम्हे आज मैने उसे कोने में छिपकर रोते देखा है ||



बरसो बीत गए है उसे शिकायत किये हुए,

आज उसने शिकायत की है जब हदे लंग दी गई |



उसके बाप के जाते ही सब कुछ बिखर गया,

इतनी हिम्मत नहीं थी किसी में, के उसके जीते-जी अलग हो जाते ||

कैंसर था उसे इलाज़ के लिए दर-बदर ठोकरे खा रहा था,

ऐसा नहीं है के इलाज़ मुमकिन नहीं था |



ये तो उसके नालायक वारिशों की कमी थी,

जिन्होंने उस फ़रिश्ते को चैन से जीने नहीं दिया ||



जानता हूँ मैं ना-समझ हूँ,

मगर इतना भी नहीं के अच्छे बुरे में फर्क नहीं जानता |



वो कितना रोई थी दिल-ही-दिल जब उसे मालूम हुआ,

नर्स ने कहा 20000 का खर्चा है और वो ठीक हो जायेंगे ||

कैसे बीवी के कहने पर,

उसने पैसे न होने का बहाने बनाया था |

नर्स ने मुझसे बाहर आकर बताया दिया था की आक़िल,

तुम्हारे नाना ठीक हो जायेंगे मगर तुम्हारे मामा नहीं बचाना चाहते ||



दवाई लिख के देती हूँ तो पर्ची फाड़ देते हैं,

और कहते है सिकाई कर दो |



उनसे कह दो इसका कोई इलाज़ नहीं,

सिकाई के सिवा, ठीक होना होगा तो इसी से हो जाएगा ||

वो आज मेरे खवाबों में आता है,

और बात करता है मुझसे आक़िल |

और उसके बच्चे मुझसे कहते है,

यार अब्बा मेरे खवाबों में क्यों नहीं आते ||



ऐसे क्या गुनाह कर दिए हमने |||















पंतग



देखा जो आज आसमा की तरफ,

आसमा में लहराती पतंग को |



देख कर वो दिन याद आ गए,

जब स्कूल से आते ही छत पर चढ़ जाते ||



और जब तक आसमा में अपनी पतंग न लहराती,

लगातार कोशिशे करते रहते |



अस्मा में सिर्फ हमारी ही एक पतंग लहराती,

और हम चिल-चिलाती धूप में पतंग की डोर लिए ||



छाओं में खड़े रहते, आसमा में देख अपनी पतंग,

न जाने क्या ख़ुशी मिलती थी |



ऐसी ख़ुशी जो आज तक कभी नहीं मिली ||













तेरी मोहब्बत के गवाह



हली बार देखा तो लव हो गया,

दूसरी बार मिले तो सब हो गया |



तेरी जुल्फों में खो जाने को ज़ी चाहता है,

पर तू इतना तेल लगाती है के हर बार फिसल जाता हूँ ||



उसने कहा Go to hell,

मैने कहा All is well |



आज कल का बस यही प्यार है,

कंडोम में दिल और दिल में कंडोम का ख्याल है ||



उसकी मोहब्बत के बस तीन ही गवाह है,

वो, मैं और मेडिकल वाला |



एक दिन में मुलाकात,

दुसरे दिन में सुहागरात ||

तीसरे दिन में जिंदगी बर्बाद |||












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